भारत के लिए जोश और जुनून के साथ कुश्ती करने वाले दीपक पूनिया

अखाड़ों से कुश्ती का सफर शुरू करने के बाद दीपक पूनिया विश्व जूनियर चैंपियन और राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक जीतने वाले भारतीय पहलवान बने।

लेखक शिखा राजपूत
फोटो क्रेडिट 2022 Getty Images

टोक्यो 2020 में दीपक पूनिया 5 अगस्त, 2021 को अपने पहले ओलंपिक खेल में कांस्य पदक से चूक गए थे। उन्हें 86 किग्रा भार वर्ग के मेडल बाउट में सैन मरिनो के माइल्स अमीन से 4-2 से हार मिली थी।

यह हार भारतीय पहलवान के लिए बहुत ही भावनात्मक थी। क्योंकि उन्होंने कुछ महीने पहले अपनी मां को खो दिया था। दीपक पूनिया अपनी मां को ओलंपिक पदक समर्पित करना चाह रहे थे।

ठीक एक साल बाद 5 अगस्त, 2022 को दीपक पूनिया एक बार फिर देश के लिए पदक जीतने के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 में पहली बार स्वर्ण पदक जीतने के लिए पाकिस्तान के मुहम्मद इनाम को आसानी से मात दी।

महज पांच साल की उम्र में कुश्ती शुरू करने वाले इस पहलवान ने प्रभावशाली पदक लिस्ट में स्वर्ण पदक की बदौलत एक और बड़ी उपलब्धि शामिल कर ली।

दीपक पूनिया के खून में बस्ती है कुश्ती

दीपक पूनिया का जन्म 19 मई, 1999 को हरियाणा के झज्जर जिले के छारा कस्बे में हुआ था। यह जगह मिट्टी में खेली जाने वाली पारंपरिक स्थानीय कुश्ती के लिए मशहूर है, जिसे अखाड़ा कहा जाता है।

दीपक पूनिया के लिए यह खेल नया नहीं था। क्योंकि उनके पिता सुभाष जो अब एक डेयरी किसान हैं, वह स्थानीय पहलवान थे।

जब वह पांच साल के थे, तब दीपक पूनिया को उनके गांव के एक अखाड़े में दाखिला दिला दिया गया था। इस अखाड़े को पूर्व पहलवान वीरेंद्र सिंह द्वारा संचालित किया जाता था। युवा दीपक को केतली उपनाम दिया गया था। क्योंकि उन्होंने एक बार कई गिलास दूध पीकर पूरा बर्तन खाली कर दिया था।

दीपक पूनिया अपने समर्पण और प्रतिबद्धता के कारण आगे बढ़े। अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर दीपक ने हरियाणा का सफर तय किया, जहां स्थानीय मुकाबलों (दंगल कहा जाता है) में कुश्ती करके उन्होंने नकद पुरस्कार जीते।

अखाड़े से लेकर मैट तक का यादगार सफर

स्कूल-स्तरीय राष्ट्रीय मीट के दौरान नई दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में एक कोच ने दीपक पूनिया की प्रतिभा को पहचाना। ये वही कोच हैं, जिन्होंने सुशील कुमार, योगेश्वर दत्त और बजरंग पुनिया जैसे दिग्गज पहलवानों को बेहतरीन तरीके से तैयार किया है।

युवा पहलवान ने अपने सपने को पूरा करने के लिए नई दिल्ली की ओर रुख किया, लेकिन उन्हें एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ा। उन्होंने दुनिया भर की प्रतियोगिताओं में इस्तेमाल होने वाली सिंथेटिक चटाई (मैट) पर ज्यादा कुश्ती नहीं की थी। अपने पूरे जीवन में कीचड़ में कुश्ती करने के बाद दीपक पूनिया को अपने खेल में काफी बदलाव करने पड़े।

हालांकि, दीपक पूनिया ने जल्दी ही खुद को अनुकूलित कर जरूरी बदलाव किए और मुकाबले भी जीतने शुरू कर दिए। उन्होंने फिलीपींस के मनीला में 2016 की जूनियर एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता और इसके बाद जॉर्जिया के त्बिलिसी में विश्व कैडेट चैंपियनशिप में एक और स्वर्ण पदक अपने नाम किया।

दीपक ने 2018 एशियाई जूनियर में एक बार फिर स्वर्ण पदक हासिल किया और इस बार स्लोवाकिया के ट्रनावा में 2018 विश्व जूनियर चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर वैश्विक मंच पर अपनी अमिट छाप छोड़ी।

2019 में दीपक पूनिया ने इतिहास को फिर से दोहराया और वह 2001 में पलविंदर सिंह चीमा के बाद जूनियर विश्व चैंपियन बनने वाले पहले भारतीय बने। उन्होंने इवेंट से पहले अपने अंगूठे में चोट लगने के बाद भी 86 किग्रा का खिताब हासिल किया।

धीरे-धीरे खुद में किए बदलाव

विश्व जूनियर चैंपियनशिप जीतने के एक महीने बाद दीपक पूनिया कजाकिस्तान के नूर सुल्तान में सीनियर वर्ल्ड चैंपियनशिप में फिर से प्रतिस्पर्धा करने उतरे। पहलवान ने 86 किग्रा वर्ग के फाइनल में अपनी जगह पक्की की। यहां उनके पास अपने गुरु सुशील कुमार के बाद दूसरे भारतीय कुश्ती विश्व चैंपियन बनने का सुनहरा मौका था।

जूनियर वर्ल्ड्स प्रतियोगिता के दौरान कंधे की चोट बनी रही। साथ ही पैर में लगी चोट का दर्द उनके लिए काफी असहनीय हो गया। वह फाइनल में ओलंपिक और विश्व चैंपियन ईरान के हसन यज्दानी के खिलाफ कुश्ती करने में सक्षम नहीं थे और उन्हें रजत पदक से संतोष करना पड़ा।

फाइनल तक पहुंचने के कारण उन्हें टोक्यो ओलंपिक के लिए कोटा स्थान हासिल करने में मदद मिली, जहां वह कांस्य पदक से चूक गए।

दीपक पूनिया ने निराशा को अपनी जीत के सफर का रोड़ा नहीं बनने दिया। उन्होंने बर्मिंघम में राष्ट्रमंडल खेल में स्वर्ण पदक जीतने से पहले 2021 और 2022 में एशियाई चैंपियनशिप में दो रजत जीते।

पूनिया 2010 और 2018 से दो बार के राष्ट्रमंडल खेल के चैंपियन पाकिस्तान के मुहम्मद इनाम के खिलाफ प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। 23 वर्षीय भारतीय पहलवान ने मैच 3-0 से जीतकर गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

इस यादगार जीत के बाद दीपक पूनिया ने कहा, "यह मेरे लिए बहुत गर्व का पल है। एक स्वर्ण पदक के साथ एक मंच पर खड़े होने, भारतीय राष्ट्रगान बजने और इस तरह की भीड़ के साथ आपका नाम गूंजने से बड़ा कोई सुखद एहसास नहीं है।"

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