बजरंग पुनिया

भारत IND

रेसलिंग

  • जन्म का साल
    1994

बायोग्राफी

बजरंग पुनिया

बजरंग पुनिया एक जबरदस्त पहलवान है। पुनिया किसी भी श्रेणी में दुनिया के नंबर 1 पहलवान बनने वाले पहले भारतीय है। इसके अलावा दो विश्व चैंपियनशिप पदक और प्रसिद्ध जर्मन लीग में कुश्ती करने वाले भी पहले भारतीय हैं।

हरियाणा के झज्जर से आकर, बजरंग पुनिया ने भारतीय कुश्ती में अपना नाम कमाना जल्दी ही शुरू कर दिया क्योंकि बचपन से ही वह इस खेल से प्यार करते थे।

साधारण परिवार से आने वाले बजरंग पुनिया के पास शुरुआत में क्रिकेट और बैडमिंटन के सामान खरीदने के पैसे नहीं होते थे। उस समय बच्चे कबड्डी और रेसलिंग में बहुत रूचि रखते थे और पुनिया के गांव में इसका प्रचलन था।

हालांकि उनके पिता बलवान सिंह भी रेसलर ही थे और युवा बजरंग उनकी कुश्ती देखने के लिए स्कूल तक छोड़ देते थे। बजरंग ने पहले कहा था कि “मुझे नहीं पता कि कब कुश्ती मेरी जिंदगी का हिस्सा बन गई।”

बजरंग ने 14 साल क उम्र में अखाड़े में ट्रेनिंग करना शुरू कर दिया और जल्दी ही वह ओलंपिक मेडलिस्ट योगेश्वर दत्त से मिले। इसके बाद योगेश्वर उनके मेंटर के साथ साथ पार्टनर भी बनें।

बजरंग पुनिया का नाम सबसे पहले सुर्खियों में साल 2013 में सबसे पहले आया, जब उन्होंने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप और वर्ल्ड चैंपियनशिप मेंस फ्रीस्टाइल 60 किलोग्राम वर्ग में कांस्य पदक जीता

साल 2014 में उनके हाथ और सफलता लगी और उन्होंने एशियन चैंपियनशिप, कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल अपने नाम किया।

बजरंग पुनिया का परिवार साल 2015 में सोनीपत में शिफ्ट हुआ, जहां से बजरंग आसानी से स्पोर्ट्स ऑथरिटी ऑफ इंडिया में ट्रेनिंग करने के साथ साथ कैंप में भी हिस्सा ले सकें। लेकिन इसके तुरंत बाद ही उन्हें चोट ने घेर लिया, जिसकी वजह से उन्हें 9 महीने के लिए मैदान से दूर होना पड़ा।

बजरंग पुनिया ने इस तरह की स्थिति का सामना साल 2011 में किया था, तब उन्हें गर्दन की चोट के कारण 6 महीनों के लिए खेल से दूर होना पड़ा। इसी वजह से उन्हें विश्वास था कि वह वापसी कर सकते हैं और हुआ भी ठीक वैसे ही।

2015 में लास वेगास में विश्व चैंपियनशिप में बजरंग पुनिया एक्शन में लौटे और हालांकि पहले दौर में उन्हें हार झेलनी पड़ी। हालांकि उनके पास रेपेचेज राउंड के माध्यम से कांस्य जीतने का मौका था।

भारतीय पहलवान ने इस दौरान अच्छी कोशिश की और उन्होंने वेशिल शुपटर को कड़ी टक्कर दी लेकिन उनकी कोशिश नाकाफी साबित हुई। यह हार बजरंग के करियर के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई।

साल 2015 में उन्होंने फर्स्टपोस्ट से बातचीत में बताया था कि उस हार ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया था, मैंने यह सोचना शुरू कर दिया कि अगर मैं थोड़ा और प्रशिक्षित होता तो मैं उस स्पर्धा में पदक जीत सकता था। इसने मेरे अंदर एक भूख को जगाया और मैंने एक पागल आदमी की तरह प्रशिक्षण शुरू कर दिया। 2015 की चोट ने मुझे कभी हार नहीं मानना ​​सिखाया।”

इसके बाद उन्होंने ट्रेनिंग शुरू की और इसका फायदा भी उन्हें मिला। बजरंग पुनिया ने साल 2016 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीता, इसके साथ ही साल 2017 में वह एशियन चैंपियन बनें। उनके दोनों खिताब 65 किलोग्राम वर्ग में थे।

साल 2018 में उनके हाथ और सफलता लगी। कॉमनवेल्थ गेम्स और एशियन गेम्स में गोल्ड जीतने के बाद उन्होंने एशियन चैंपियनशिप में कांस्य जीता।

इसके अलावा वर्ल्ड चैंपियनशिप में उन्होंने सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया।ये कारनामा करने वाले वह भारत के पहले पहलान थे।

इसके बाद साल 2019 में उन्होंने कांस्य पदक जीतकर, अपना तीसरा वर्ल्ड चैंपियनशिप मेडल जीता। इसके साथ ही उन्होंने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई भी कर लिया। इसके बीच बीच में, उन्होंने अपने क्लब VFK Schifferstdat के लिए जर्मन लीग में अपना पहला मैच भी जीता, जिसमें पूरे क्राउड ने उनके नाम को पुकारा, जिससे दिखता है कि उन्हें वहां कितना प्यार मिला।

बजरंग पुनिया को साल 2019 में भारत के सबसे बड़े खेल अवॉर्ड राजीव गांधी खेल रत्न से सम्मानित किया गया।

बजरंग पुनिया ओलंपिक में गोल्ड जीतने का सपना लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, उन्होंने कोच शाको बेंदिनाइटिस के साथ विदेश में प्रशिक्षण लिया, इस दौरान शारीरिक फिटनेस पर ध्यान देने के अलावा मुकाबलों के दौरान अपनी सांस पर भी काम किया।

बजरंग पुनिया ने कहा कि "मैंने साल 2018 और 2019 में अच्छा प्रदर्शन किया है। मुझे उम्मीद है कि मेरा प्रदर्शन टोक्यो ओलंपिक में भी जारी रहेगा और मैं देश के लिए गोल्ड जीतूंगा।”

इसमें कोई संदेह नहीं है कि बजरंग पुनिया को टोक्यो ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतने के लिए फेवरेट में से एक क्यों माना जाता है।

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