खो खो: वह खेल जिसका भारत के महाकाव्य महाभारत से है कनेक्शन

जुझारू परिस्थितियों में खेला जाने वाला खेल खो खो में गति, सटीकता, बुद्धिमत्ता और चपलता की आवश्यकता होती है। जानें इस खेल के नियम।

लेखक मनोज तिवारी
फोटो क्रेडिट Khelo India

बच्चों के टैग खेल की तरह ही खो खो एक पारंपरिक भारतीय खेल है जो हजारों सालों से किसी न किसी रूप में अस्तित्व में रहा है।

हालांकि खो-खो खेल की शुरुआत कब हुई इसे बता पाना कठिन है। ऐसा माना जाता है इस खेल के कुछ पहलुओं का उल्लेख प्राचीन भारतीय महाकाव्य महाभारत में वर्णित चक्रव्यूह में रहा है।

खो खो का इतिहास

महाभारत एक प्राचीन भारतीय महाकाव्य है जो हस्तिनापुर राज सिंहासन के लिए दो चचेरे भाईयों कौरव और पांडवों के बीच भीषण युद्ध पर आधारित है। इस महाकाव्य में पांडव नायक हैं और कौरव विरोधी हैं। इसका मुख्य कथानक 18 दिनों तक चलने वाले युद्ध के इर्द-गिर्द घूमता है।

युद्ध के 13 वें दिन गुरु द्रोणाचार्य जो पांडवों और कौरवों दोनों के युद्ध शिक्षक थे, लेकिन महाभारत के युद्ध में वह स्वयं कौरव की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे। उन्होंने चक्रव्यूह तैयार किया, जो बेहद घातक व लगभग अभेद्य युद्ध व्यूह रचना थी। चक्रव्यूह ऐसी रचना थी, जिससे पांडव की पराजय बिल्कुल निश्चित थी।

द्रोणाचार्य पुरस्कार खेल प्रशिक्षकों के लिए भारत का सर्वोच्च पुरस्कार है, संयोग से इसे चक्रव्यूह की रचना करने वाले गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर ही रखा गया है।

दरअसल पांचों पांडव में से सिर्फ अर्जुन ही चक्रव्यूह को भेदना जानते थे, जबकि बाकी सभी चार भाई इस व्यूह को तोड़ना नहीं जानते थे। अर्जुन की गैरमौजूदगी में अर्जुन के युवा पुत्र अभिमन्यु ने चक्रव्यूह तोड़ने का निश्चय किया। हालांकि अभिमन्यु को चक्रव्यूह का भेदन तो पता था, लेकिन उसे इससे निकलना नहीं आता था।

चक्रव्यूह में अभिमन्यु ने बड़े ही आक्रामक अंदाज में प्रवेश किया, लेकिन केंद्र में उस अकेले के सामने कई महारथी थे, जहां उसकी हत्या हो जाती है। लेकिन पांडवों के लिए चक्रव्यूह तोड़कर अभिमन्यु ने युद्ध का पलड़ा उनकी ओर मोड़ दिया।

कहा जाता है कि चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए अपनाई गई अभिमन्यु से लड़ने की शैली रिंग प्ले की अवधारणा से काफी मिलती-जुलती थी, जो खो खो के खेल में रक्षात्मक रणनीति का अहम हिस्सा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि खो-खो की उत्पत्ति भारत के महाराष्ट्र राज्य में हुई थी और प्राचीन काल में इसे रथों पर खेला जाता था और इसे राथेरा कहा जाता था। 

खो खो के वर्तमान संस्करण में इसे पैदल व्यक्तियों द्वारा खेला जाता है, इसकी उत्पत्ति 1914 में हुए प्रथम विश्व युद्ध के समय की मानी जाती है।

पुणे के डेक्कन जिमखाना क्लब में सबसे पहले खो खो के लिए औपचारिक नियम और कानून बने। इसने खेल को आकार दिया।

कबड्डी और मलखंब जैसे अन्य स्वदेशी भारतीय खेलों के साथ खो खो का प्रदर्शन 1936 के बर्लिन ओलंपिक के दौरान किया गया था।

पहली बार अखिल भारतीय खो खो चैंपियनशिप 1959-60 में आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में आयोजित की गई थी, जबकि महिलाओं के लिए राष्ट्रीय चैंपियनशिप 1960-61 में महाराष्ट्र के कोल्हापुर में खेली गई थी।

खो खो को नई दिल्ली में हुए 1982 के एशियाई खेलों के दौरान प्रदर्शनी गेम के तौर पर पेश किया गया था और 1996 में कोलकाता में पहली बार एशियाई चैंपियनशिप आयोजित की गई थी। यह गुवाहाटी में दक्षिण एशियाई खेल 2016 में मेडल गेम के तौर पर शामिल किया गया था।

वर्तमान में लगभग 25 देशों में राष्ट्रीय खो खो टीम है।

खो खो खेल को खेलने का तरीका

टैग खेल की तरह खो-खो का उद्देश्य एक प्रतिद्वंद्वी को टैग करना या उसका शिकार करना और अंक अर्जित करना होता है। हालांकि इस खेल में कड़े नियम हैं, जबकि ये पूरे मैदान में खेला जाने वाला गेम है।

वहीं सीनियर स्तर पर होने वाले अंतरराष्ट्रीय खो खो मैच छोटे से ब्रेक के साथ दो पारियों में बंटे होते हैं। प्रत्येक पारी में दो टर्न होते हैं, जो नौ मिनट तक खेली जाती है। इसमें टीमें पीछा और बचाव करती हैं। दो पारियों के अंत में सबसे अधिक अंक वाली टीम मैच जीत जाती है।

यदि मैच के अंत में दोनों टीमों के अंक बराबर होते हैं, तो विजेता का फैसला करने के लिए एक अतिरिक्त पारी खेली जाती है। इसके बावजूद भी यदि कोई निश्चित विजेता नहीं होता है, तो दोनों टीमें एक-एक टर्न लेती हैं और कम से कम समय में एक अंक जीतने वाली टीम को विजेता घोषित कर दिया जाता है।

खो खो खेल का मैदान और आयाम

प्रतिस्पर्धी खो खो खेल का मैदान आयताकार होता है, जिसका माप 27mx16m होता है। दो 27m की रेखाएं साइड लाइन्स कहलाती हैं जबकि दो 16m की ड्यूब रेखा एंड लाइन्स कहलाती हैं।

दो एंड लाइन्स के समानांतर 1.5 मीटर की दूरी पर क्षेत्र के दोनों सिरों पर दो छोटे आयताकार क्षेत्रों का सीमांकन करने के लिए दो रेखाएं खींची जाती हैं, जिन्हें फ्री जोन कहा जाता है।

दो फ्री जोन के भीतरी किनारे के बीच में दो पोल्स (120-125 सेमी लंबाई और 9-10 सेमी व्यास) जमीन पर लंबवत लगाए जाते हैं।

एक छोटी गली जिसकी चौड़ाई 30 सेमी होती है, साइड लाइन्स के समानांतर दो पोल के निचले हिस्से को जोड़ती है और ये केंद्रीय लेन कहलाती है। दो मुक्त क्षेत्रों के बीच के क्षेत्र को फिर आठ और लेन से विभाजित किया जाता है, जिन्हें क्रॉस लेन कहा जाता है, जिन्हें एक दूसरे से समान दूरी और एंड लाइन्स के समानांतर खींचा जाता है। क्रॉस लेन 35 सेमी चौड़ी होती हैं।

खो खो के नियम

खो-खो मैच की शुरुआत सिक्का उछालने से होती है। विजेता कप्तान अपने हाथों को ऊपर रखता है और अपनी तर्जनी को या तो केंद्रीय रेखा की ओर इशारा करता है, जिसका मतलब चेज करना होता है। जबकि साइड लाइन का इशारा करके डिफेंस करने का संकेत देता है।

चेज करने वाली टीम जिसमें नौ खिलाड़ी शामिल होते हैं, चेज करने के लिए मैदान में उतरती है। वहीं आठ खिलाड़ी बैठ जाते हैं, जो आठ छोटे-छोटे आयतों में होते हैं, जो सेंट्रल और क्रॉस लेन से बनते हैं।

लगातार चेज करने वाले एक ही दिशा में नहीं जा सकते हैं और उसे साइड लाइन्स के अपोजिट में पोजीशन लेना होता है। नौवें चेजर को अटैकर या एक्टिव चेजर कहते हैं, जो मैच का आगाज फ्री जोन से करता है। सभी खो खो टीम में 12 खिलाड़ी होते हैं, जिनमें से तीन का इस्तेमाल सब्स्टिट्यूट के रूप में होता है।

डिफेंडिंग टीम मैच की शुरुआत में ग्रुप में तीन डिफेंडर भेजती है।

एक्टिव चेजर इन तीनों डिफेंडर में से किसी एक को टैग करना यानी छूना होता है।

चेज के दौरान चेजर का मूवमेंट भी निश्चित होता है। चेजर जिस दिशा में पहला स्टेप बढ़ाता है, उसे उसी दिशा में दौड़ लगाना होता है। डिफेंडर को चेज करने के दौरान सेंट्रल लेन को क्रॉस नहीं करना होता है। 

यदि चेजर अपनी दिशा को बदलना चाहता है या सेंट्रल लाइन के हाफ को क्रॉस करने के लिए पहले फ्री जोन में जाना होता है तो वह पोल को टच करने के बाद दिशा बदलकर गेम को और दिलचस्प बनाना जारी रख सकता है।

हालांकि वे अपने साथी गैर एक्टिव चेजर को खो खो बोलते हुए टैग करके उन्हें चेज की जिम्मेदारी देते हैं। जैसे ही चेजर अपने साथी को खो बोलता है कि वह चेजर एक्टिव हो जाता है, जबकि एक्टिव चेजर इनएक्टिव हो जाता है और खो बोलकर उसकी जगह बैठ जाता है।

सामान्य रूप से खो तब दिया जाता है, जब डिफेंडर सेंट्रल लेन के आखिरी छोर को क्रॉस कर जाता है। इसलिए किसी भी चेजर को टैगिंग का तब सामना करना पड़ता है, जब चेजर कोर्ट की दिशा में होता है। टैग या खो कंधे और कमर के बीच में ही सामान्य रूप से मानी जाती है, अगर ऐसा नहीं होता है तो टीमों को अवैध रूप से हर्जाना देना होता है। 

जब चेजर द्वारा डिफेंडर टच कर लिया जाता है, तब चेजिंग टीम अंक जीतने में सफल होती थी। डिफेंडिंग टीम के जब तीन डिफेंडर आउट हो जाते हैं, तब उन्हें तीन डिफेंडर फौरन से खेल में शामिल करने होते हैं। एक टर्न के दौरान तीन डिफेंडर के हर ग्रुप को सिक्वेंस बनाए रखना होता है। 

आखिरी बचे डिफेंडर बैच को टैग करने वाला अटैकर चेज जारी नहीं रख सकता है। इसलिए उन्हें अपने साथियों को खो या टैग करना होता है, जिससे नए बैच का डिफेंडर गेम में शामिल हो सके। 

परंपरागत रूप से टीमें अपने सर्वश्रेष्ठ तीन डिफेंडर को सबसे पहले बैच में डिफेंस में उतारती है। नौ मिनट के बाद चेज करने वाली टीम डिफेंड करने वाली टीम बन जाती है और पारी का दूसरा टर्न खेला जाता है।यही क्रम अन्य पारी में भी दोहराया जाता है और सबसे अधिक अंक वाली टीम जीत जाती है।

हालांकि, चेज करने वाली टीम का कप्तान अपनी पहली पारी को समय से पहले समाप्त कर सकता है, जैसे क्रिकेट में पारी घोषित कर दी जाती है, बस उन्हें नौ से अधिक अंक चाहिए होते हैं। दूसरी पारी में कप्तान कभी भी टर्न खत्म कर सकता है।

साथ ही क्रिकेट की तरह ही इसमें भी फॉलोऑन होता है। खो-खो में पहले चेज करने वाली टीम के पास पहली पारी में छह या आठ अंक से अधिक की बढ़त होने पर अपने विपक्षी टीम पर 'फॉलो ऑन' लागू करने का विकल्प होता है।

यदि एक फॉलोऑन लागू किया जाता है, तो पिछड़ने वाली टीम दूसरी पारी में पहले चेज करती है और जिस टीम ने फॉलोऑन को लागू किया है, वह अपने चेज करने की बारी ले सकती है यदि विपक्षी टीम पिछले अंक की भरपाई करने में सफल होती है।

फुटबॉल की तरह खो-खो में भी पीला और लाल कार्ड दिया जाता है। ये कार्ड तब दिए जाते हैं, जब खिलाड़ी का व्यवहार अच्छा न हो या अत्यधिक आक्रामक टैकल करता हो या कई अन्य तकनीकी गड़बड़ी करने पर कार्ड दिए जाते हैं।

पीला कार्ड पहली सावधानी है और एक मैच में दो पीले कार्ड का मतलब है कि खिलाड़ी को शेष मैच और किसी विशेष टूर्नामेंट के अगले मैच से बाहर बैठना होगा।

एक टूर्नामेंट के अलग-अलग मैचों में दो पीले कार्ड पाने वाले खिलाड़ी को अगला मैच नहीं खेलने के लिए मजबूर कर देंगे। जबकि सीधा लाल कार्ड पाने वाले खिलाड़ी को जारी मैच और टूर्नामेंट के अगले मैच से निलंबित कर दिया जाता है।

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