द्रोणाचार्य पुरस्कार: वह रोशनी जिसने चमकाए अनेक स्पोर्ट्स सितारे

द्रोणाचार्य पुरस्कार वह सम्मान है जो खेल जगत में एथलीटों के कोचों को दिया जाता है। पहली बार किसने जीता था यह खिताब? सब जानें यहां।

लेखक जतिन ऋषि राज

जब भी किसी स्टार खिलाड़ी की बात होती है तो उसमें एक मुद्दा ज़रूर उठता है और वह है कोच। एक कोच ही होता है जो एक आम इंसान को एक खिलाड़ी में तब्दील करता है और उस खिलाड़ी को रोज़ बेहतर करने की होड़ में लग जाता है।

भारत में एक कोच के योगदान को द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है क्योंकि इन्हीं योगदान से आज भारत के पास ऐसे एथलीट हैं जिन्होंने वतन का सर हमेशा उंचा किया है।

यह पुरस्कार कोच के लिए प्रेरणा का पात्र भी बन जाता है और उन्हें अपने प्रदर्शन को और बेहतर करने की प्रेरणा भी दे जाता है।

यह नेशनल स्पोर्ट्स डे यानी 29 अगस्त को दिया जाता है। यह दिन मेजर ध्यानचंद (Dhyan Chand) के जन्मदिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस खिताब के साथ अर्जुन अवार्ड, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार और ध्यान चंद अवार्ड को जोड़कर नेशनल स्पोर्ट्स अवार्ड बनाए गए हैं।

द्रोणाचार्य पुरस्कार को एतिहासिक ‘द्रोण’ के नाम पर रखा गया है जिन्होंने कौरव और पांडव को युद्धनीति सिखाई थी। यह नीति उन्होंने महाभारत के समय अपने शिष्यों को सिखाई ताकि वह अपनी हर मुश्किल का सामना कर सकें।

इस ख़िताब को ‘द्रोणाचार्य अवार्ड फोर आउटस्टैंडिंग कोचेस इन स्पोर्ट्स एंड गेम्स’ कहा जाता है। यह उन कोचों को दिया जाता है जिन्होंने 4 सालों में अपने खिलाड़ियों को ट्रेनिंग दी है।

पुरस्कार के हकदारों मिनिस्ट्री ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट् (Ministry of Youth Affairs and Sports – MYAS) द्वारा चुना जाता है। MYAS, नेशनल स्पोर्ट्स फेडरेशन, इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन, स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया और राज्य सरकार से सम्बंधित कोचों का चुनाव करती है।

विजेता को द्रोण की ब्रॉन्ज़ की मूर्ती दी जाती है और साथ ही एक प्रमाण पत्र के साथ 10 लाख रुपए का इनाम भी दिया जाता है। पहले यह राशि 5 लाख रुपए थी लेकिन इसे 2020 में बढ़ाकर 10 लाख कर दिया गया।

एक साल में ज्यादा से ज्यादा 5 द्रोणाचार्य पुरस्कार दिए जाते हैं जिनमें दो लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड भी शामिल होते हैं।

2016 रियो ओलंपिक में पी वी सिंधु के कोच थे पुलेला गोपीचंद
फोटो क्रेडिट Getty Images

किसने जीता था पहला द्रोणाचार्य पुरस्कार?

पहला द्रोणाचार्य अवार्ड सन 1985 में दिया गया था और इसे रेसलिंग कोच भालचंद्र भास्कर भागवत (Bhalchandra Bhaskar Bhagwat) ने जीता था।

भागवत के साथ कोच ओएम नाम्बियार (OM Nambiar) को भी सम्मानित किया गया था, जिन्होंने पीटी उषा (PT Usha) जैसी दिग्गज को बनाया है और साथ ही बॉक्सिंग हेड कोच ओएम प्रकाश भारद्वाज (Om Prakash Bharadwaj) को भी इस खिताब से नवाजा गया था।

वहीं द्रोणाचार्य अवार्ड को जीतने वाली महिला रेनू कोहली (Renu Kohli) थी। उन्होंने यह खिताब 2002 में अपने नाम किया था।

साल 2020 में इस खिताब से पूर्व हॉकी कप्तान और कोच जूड फेलिक्स (Jude Felix) को दिया गया था। साथ ही पिस्टल शूटिंग कोच जसपाल राणा (Jaspal Rana), पैरा-बैडमिंटन कोच गौरव खन्ना (Gaurav Khanna), वुशु कोच कुलदीप हन्डू (Kuldeep Handoo) और मलखंभ कोच योगेश मालवीय (Yogesh Malviya) को भी इस पुरस्कार से नवाज़ा गया है।

क्यूबा के ब्लास इग्लेसियस फर्नांडीज (Blas Iglesias Fernandez) पहले विदेशी कोच हैं जिन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। फर्नांडीज को यह खिताब साल 2012 में दिया गया था। फर्नांडीज पूर्व बॉक्सिंग कोच हैं जो भारतीय बॉक्सिंग से 1990 में जुड़े थे और उन्होंने विजेंदर सिंह (Vijender Singh) और डिंग्को सिंह (Dingko Singh) जैसे मशहूर मुक्केबाज दिए हैं।

द्रोणाचार्य विजेता

पुलेला गोपीचंद

भारतीय बैडमिंटन के वर्तमान मुख्य चीफ कोच और पूर्व ऑल इंग्लैंड चैंपियन पुलेला गोपीचंद (Pullela Gopichand) को भारतीय बैडमिंटन के सफलता का श्रेय दिया जाता है।

पुलेला गोपीचंद के कार्यकाल में भारत ने दो ओलंपिक मेडल अपने नाम किए हैं और इस वजह से इस खेल में आज भारत का डंका बजता है। साल 2008 में इस दिग्गज ने अपनी अकादमी खोली जहां आज भारत के युवा और सर्वश्रेष्ठ दोनों अभ्यास करते हैं।

गोपीचंद को द्रोणाचार्य पुरस्कार से 2009 में सम्मानित किया गया था। यह उनका दूसरा नेशनल गेम्स का खिताब था और इससे पहले उन्होंने 1999 में अर्जुन पुरस्कार अपने नाम किया था।

महावीर सिंह फोगाट

गीता फोगाट (Geeta Phogat) और बबीता फोगाट (Babita Phogat) के पिता की हैसियत से जाने जाने वाले महावीर सिंह फोगाट (Mahavir Singh Phogat) को 2016 से द्रोणाचार्य पुरस्कार से नवाजा गया था।

खुद एक पहलवान रह चुके महावीर ने 19 के दशक में हरियाणा में कोचिंग की शुरुआत की और आज उन्हों की बदौलत उनकी बेटियों ने भारतीय रेसलिंग में देश का नाम उंचा किया है।

उन्हें अक्सर गीता, बबीता और रितु फोगाट के करियर की सफलता का श्रेय दिया जाता है। इतना ही नहीं बल्कि महावीर सिंह फोगाट ने विनेश फोगाट (Vinesh Phogat) को भी ट्रेनिंग दी है और इस ट्रेनिंग से इस पहलवान ने एशियन गेम्स और कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल अपने नाम किया है। साथ ही इस कोचिंग का सिलसिला यहीं नहीं रुका और उन्होंने प्रियंका फोगाट (Priyanka Phogat) को भी अपने गुर सिखाएं हैं।

एमके कौशिक

मास्को 1980 ओलंपिक गेम्स में भारतीय हॉकी टीम ने गोल्ड मेडल पर अपने नाम की मुहर लगाई थी और उस समय उनके कोच थे एमके कौशिक (MK Kaushik) - महाराज कृष्ण कौशिक।

एक कोच के नाते एमके कौशिक ने भारतीय मेंस हॉकी टीम को 1998 एशियन गेम्स और 2002 कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल की राह दिखाई थी। इतना ही नहीं इस दिग्गज ने अपनी ट्रेनिंग से महिला टीम को 2006 एशियन गेम्स में ब्रॉन्ज़ जितवाया था।

एमके कौशिक को 2002 में द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किया गया था।

2011 से भारतीय सरकार ने द्रोणचार्य लाइफटाइम अवार्ड भी जारी कर दिया था और यह सम्मान उन्हें दिया जाता है जिन कोचों ने भारतीय खेल को 20 या उससे ज़्यादा सालों तक सर्विस दी है।

इस पुरस्कार को जीतने वाले दिग्गज को 15 लाख रुपए और द्रोण के पुतले के साथ सर्टिफिकेट भी दिया जाता है।

द्रोणचार्य लाइफटाइम अचीवमेंट पुरस्कार पहली बार एथलेटिक्स को कुंतल रॉय (Kuntal Roy) और हॉकी कोच राजिंदर सिंह (Rajinder Singh) को दिया गया था।

2020 में कोचों को इस खिताब से सम्मानित किया गया है और उनके नाम कुछ इस प्रकार हैं।

धर्मेन्द्र तिवारी धर्मेंद्र तिवारी (Dharmendra Tiwary) (आर्चरी), पुरुषोत्तम (Purushottam) (एथलेटिक्स), शिव सिंह (Shiv Singh) (मुक्केबाजी), रोमेश पठानिया (Romesh Pathania) (हॉकी), कृष्ण कुमार हुड्डा (Krishan Kumar Hooda) (कबड्डी), विजय भालचंद्र मुनीश्वर (Vijay Bhalchandra Munishwar) (पावरलिफ्टिंग), नरेश कुमार (Naresh Kumar) (टेनिस) और ओम प्रकाश दहिया (Prakash Dahiya) (कुश्ती)।च

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