मलखंब: जानिए भारत के इस प्राचीन खेल के नियम, इतिहास और कैसे हुई थी इसकी शुरुआत

मार्शल आर्ट के प्रशिक्षण के रूप में इस खेल की शुरुआत हुई थी, मलखंब पिछले कुछ वर्षों में एक शानदार आकर्षक खेल के रूप में विकसित हुआ है।

लेखक विवेक कुमार सिंह
फोटो क्रेडिट SAI Media

भारत के इस प्राचीन खेल मलखंब (एक वर्टिकल पोल पर होने वाला भारतीय जिमनास्टिक) ने पहली बार बर्लिन 1936 ओलंपिक के दौरान पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया।

मलखंब कबड्डी सहित कई स्वदेशी भारतीय खेलों में से एक था, जिसे ओलंपिक शुरू होने से पहले बर्लिन में प्रदर्शित किया गया था। इन खेलों में स्थानीय लोगों के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने भी भाग लिया था।

तब से, यह खेल पूरी दुनिया में फैल गया है और साल 2019 में पहली बार मलखंब विश्व चैंपियनशिप आयोजित की गई थी, जिसमें 15 से अधिक देशों के 150 से अधिक एथलीट भाग लेने के लिए मुंबई आए थे।

इस खेल को यहां शोहरत तो मिली, लेकिन मलखंब का एक समृद्ध इतिहास रहा है जिसकी खास झलक यहां देखने को नहीं मिली।

मलखंब क्या है

देखा जाए, तो मलखंब एक सीधे खड़े खंबे पर किया गया हवाई योग या जिमनास्टिक का रूप है।

हालांकि, इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलेगा कि मलखंब प्राचीन मार्शल आर्ट का एक रूप है, जिसका उपयोग पहलवानों और प्राचीन युग के योद्धाओं को ट्रेनिंग में सहायक के रूप में किया जाता था।

'मल' का शाब्दिक अर्थ है कुश्ती और 'खंब' का अर्थ है कंबा। दोनों शब्द मिलकर मलखंब बनते हैं, जिसका अर्थ है खंबे पर कुश्ती। पहलवान और योद्धाओं ने मार्शल आर्ट ट्रिक्स को सफल बनाने के लिए प्रशिक्षण उपकरण के रूप में पोल ​​का इस्तेमाल किया, जिसे वे बाद में रिंग या युद्ध के दौरान मैदान में विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते थे।

मलखंब का इतिहास

कहीं-कहीं ये भी कहा जाता है कि ये सभी प्राचीन भारतीय खेलों की जननी है, मलखंब की शुरुआत कब और कैसे हुई थी, इसका पता लगाना लगभग असंभव है।

मलखंब के बारे में प्राचीन भारतीय महाकाव्यों जैसे रामायण, प्राचीन चंद्रकेतुगढ़ मिट्टी के बर्तनों में पाए जा सकते हैं जो एक शताब्दी ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा भारत में बौद्ध चीनी तीर्थयात्रियों के किताबों में भी इसका उल्लेख है।

मलखंब का सबसे पहला प्रत्यक्ष वर्णन 12वीं शताब्दी की शुरुआत में मानसोलस नामक पाठ में पढ़ा जा सकता है, जिसे चालुक्य राजा सोमेश्वर III द्वारा लिखा गया था। उन्होंने उस समय वर्तमान के दक्षिण भारत में शासन किया था।

1600 के दशक के अंत से 1800 के दशक की शुरुआत तक, कला कुछ हद तक निष्क्रिय रहा। उसके बाद बलमभट्ट दादा देवधर, महान मराठा राजा पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अपनी पेशवा की सेना को प्रशिक्षित करने के लिए कला को पुनर्जीवित किया।

कई ऐसे संदर्भ भी मिले हैं कि ऐतिहासिक मराठा साम्राज्य की हस्तियां जैसे लक्ष्मीबाई, झांसी की रानी, ​​तांतिया टोपे और नाना साहब ने मलखंब का अभ्यास किया था। इस प्रशिक्षण ने संतुलन, निपुणता और अनुशासित रहने में मदद की और विशेष रूप से मराठा योद्धाओं के अनुकूल थी, जिन्हें गुरिल्ला युद्ध के अग्रदूत के रूप में जाना जाता था।

मराठा साम्राज्य के दौरान मलखंब की लोकप्रियता ने भारतीय राज्य महाराष्ट्र को कला रूप का केंद्र बना दिया।

वास्तव में बर्लिन 1936 में मलखंब और अन्य भारतीय खेलों का प्रदर्शन महाराष्ट्र के अमरावती शहर के बाहर स्थित हनुमान व्यायाम प्रसारक मंडल (HVPM) नामक एक अल्पज्ञात शारीरिक शिक्षा संस्थान के सदस्यों द्वारा किया गया था।

मलखंब ने पहली बार साल 1958 में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय जिमनास्टिक चैंपियनशिप में राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 1962 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर में पहली बार राष्ट्रीय मलखंब चैंपियनशिप आयोजित की गई थी।

1981 में मलखंब फेडरेशन ऑफ इंडिया की स्थापना की गई और राष्ट्रीय स्तर के संगठन ने उसी वर्ष बाद में खेल के नियमों को औपचारिक रूप दिया।

ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 से पहले फेस्टिवल 2018 में मलखंब का प्रदर्शन किया गया। यह खेल टोक्यो 2020 ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में उपस्थित होने वाला था, लेकिन COVID-19 के कारण ये खेल समारोह का हिस्सा नहीं बन पाया था।

मलखंब को 2022 से खेलो इंडिया यूथ गेम्स में भी शामिल किया गया है।

मलखंब के नियम

मलखंब के नियम काफी सरल और जिमनास्टिक के जैसे ही हैं।

प्रतिभागियों को सीधे खड़े एक पोल या लटकी हुई रस्सी के सहारे कलाबाजी करतब दिखानी होती है और जज कौशल पर उनकी महारत के अनुसार उन्हें स्कोर देते हैं।

प्रतियोगियों को मुख्य रूप से पांच अलग-अलग श्रेणियों पर आंका जाता है - माउंटिंग (जहां एथलीट कूदते हैं और पोल पर दौड़ते हैं), एक्रोबेटिक्स (जहां एथलीट एक्रोबेटिक फ्लिप करते हैं, पोल पर घुमते हैं), कैच (जहां एथलीट हवा में उड़ने के बाद पोल पकड़ते हैं), बैलेंस (जहां एथलीट पोल पर अपना संतुलन दिखाते हैं) और डिसमाउंट (जहां एथलीट पोल के ऊपर से कूदते हैं)।

जज प्रत्येक प्रतियोगी को एक प्रदर्शन के बाद स्कोर देते हैं और उच्चतम स्कोर वाले को विजेता घोषित किया जाता है।

मलखंब के प्रकार

कुछ वर्षों से तीन प्रकार के मलखंब ने प्रतियोगिताओं में लोकप्रियता हासिल की है। वे हैं पोल ​​मलखंब, हैंगिंग मलखंब और रोप मलखंब

पोल मलखंब मूल रूप से मलखंब का पारंपरिक रूप है। प्रतियोगी लकड़ी के खंभे पर प्रदर्शन करते हैं जिसकी ऊंचाई 2.6 मीटर होती है और उस लकड़ी का आधार 55 सेमी चौड़ा होता है। पोल धीरे-धीरे शीर्ष पर 35 मीटर की गहराई तक पतला हो जाता है।

वहीं दूसरी ओर हैंगिंग मलखंब में एक छोटा पोल प्रयोग होता है, जो हुक या जंजीर के सहारे लटकी होती है। हैंगिंग मलखंब में पोल ​​का निचला भाग जमीन को नहीं छूता है।

रोप मलखंब एक लटकी हुई रस्सी पर किया जाता है जो 5.5 मीटर लंबी और 2 सेमी चौड़ी होती है।

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