पहला फीफा विश्व कप और इसका एंटवर्प ओलंपिक 1920 से कनेक्शन

इस लेख के माध्यम से जानिए कैसे उरुग्वे ने 1930 में आयोजित पुरुषों के पहले फीफा विश्व कप की मेजबानी के साथ जीत हासिल की।

लेखक रौशन प्रकाश वर्मा
फोटो क्रेडिट Getty Images

साल 1930 में 13 से 30 जुलाई तक, पुरुषों के लिए पहला फीफा विश्व कप उरुग्वे में आयोजित किया गया था और इस प्रतियोगिता की शुरुआत ने फुटबॉल के खेल को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।

जिस प्रतियोगिता को आज हम फीफा विश्व कप के रूप में जानते हैं उसकी शुरुआत सिर्फ 13 टीमों के साथ एक आमंत्रण टूर्नामेंट के तौर पर हुई थी। यह बेहद प्रतिष्ठित फुटबॉल टूर्नामेंट दुनिया में सबसे ज्यादा फॉलो किए जाने वाले खेल आयोजनों में से एक है।

आपको बता दें कि कतर में आयोजित फीफा विश्व कप 2022 के लिए उपलब्ध 31 स्थानों पर जगह बनाने के लिए छह महाद्वीपों के 200 से अधिक देशों ने क्वालीफायर में जोर आजमाइश की। हालांकि, मेजबान देश को को इस प्रतियोगिता के लिए क्वालीफाई का अधिकार होता है।

इस आर्टिकल के माध्यम से जानिए और समझिए कि इस प्रतियोगिता की शुरुआत कैसे हुई - उरुग्वे में पहला फीफा विश्व कप 1930

प्रतियोगिता की शुरुआत - एंटवर्प में 1920 ओलंपिक ने इस प्रतिष्ठित टूर्नामेंट की नींव रखी

साल 1904 में फुटबॉल की विश्व शासी निकाय, फीफा की स्थापना की गई थी। इसके बाद से ही पुरुषों की विश्व चैंपियनशिप की आवश्यकता पर विचार किया जाने लगा और ओलंपिक इसकी नींव रखने के लिए एक सही और सटीक मंच के रूप में उभरकर आया।

हालांकि, साल 1900 और साल 1904 के ओलंपिक में फ़ुटबॉल को शामिल किया गया था, लेकिन इसे सिर्फ एक प्रदर्शन खेल के रूप में शामिल किया गया। इसमें विभिन्न देशों के क्लब और स्क्रैच टीमों (वह टीम जो स्थायी नहीं होती है और जिसके खिलाड़ी अलग-अलग टीमों के लिए खेलते हैं) के बीच प्रतिस्पर्धा हुई थी।

दिलचस्प बात यह है कि लंदन 1908 के खेलों के माध्यम से ओलंपिक में फुटबॉल को मेडल गेम के रूप में शामिल किया गया था। यह पहली बार था जब किसी फुटबॉल प्रतियोगिता में विशिष्ट तौर पर अंतरराष्ट्रीय टीमों ने हिस्सा लिया था। स्टॉकहोम में 1912 के ग्रीष्मकालीन खेलों में भी, हिस्सा लेने वाली सभी टीमें यूरोप से थीं।

1914 फीफा कांग्रेस में, विश्व फुटबॉल महासंघ ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पर मुहर लगाई, जो ओलंपिक फुटबॉल टूर्नामेंट को 'शौकिया खिलाड़ियों के लिए विश्व फुटबॉल चैंपियनशिप' के रूप में मान्यता देने के लिए सहमत हुए। साथ ही फीफा ने इस आयोजन के प्रबंधन के लिए अपनी इच्छा को भी जाहिर किया।

हालांकि, प्रथम विश्व युद्ध शुरु होने के कारण 1916 का ओलंपिक रद्द हो गया और यह प्रस्ताव अंततः बेल्जियम के एंटवर्प में हुए 1920 के ओलंपिक से प्रभावी हो सका। एंटवर्प में हुई प्रतियोगिता में 13 यूरोपीय टीमों में मिस्र भी शामिल हो गया। जिसके बाद यह ओलंपिक में पहली अंतर-महाद्वीपीय फुटबॉल चैंपियनशिप बन गई।

इसके बाद ओलंपिक के आगामी दो संस्करणों (1924 और 1928) में और भी अधिक गैर-यूरोपीय टीमों ने प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। दक्षिण अमेरिकी टीम उरुग्वे ने इन दोनों ही संस्करणों में जीत हासिल की।

फीफा इस शानदार खेल की बढ़ती वैश्विक लोकप्रियता को देखते हुए ओलंपिक के इतर एक और विश्व चैंपियनशिप की शुरुआत करना चाहता था। एक अन्य चैंपियनशिप की शुरुआत का दूसरा कारण यह भी था कि उस समय केवल शौकिया (अमेचर) खिलाड़ियों को ही ओलंपिक में भाग लेने की इजाजत थी।

लेकिन, फुटबॉल के खेल में बढ़ते पेशेवर खिलाड़ियों की (विशेष रूप से पूरे यूरोप में) संख्या को देखते हुए, एक फुटबॉल विश्व कप प्रतियोगिता की आवश्यकता समय की मांग थी।

फीफा विश्व कप 1930 - उरुग्वे ने मेजबान देश के रूप में शुरुआत की

28 मई, 1928 को एम्स्टर्डम में आयोजित फीफा कांग्रेस में, महासंघ ने आधिकारिक तौर पर अपनी विश्व फुटबॉल चैंपियनशिप आयोजित करने का फैसला किया। यही वो दिन था जिसने आधिकारिक तौर पर फीफा विश्व कप की शुरुआत की नींव रखी।

हंगरी, इटली, नीदरलैंड, स्पेन और स्वीडन जैसे देशों ने प्रतियोगिता के पहले संस्करण की मेजबानी के लिए अपनी उम्मीदवारी का प्रस्ताव रखा लेकिन अंत में मेजबानी का अधिकार उरुग्वे को मिला।

1930 में उरुग्वे अपनी स्वतंत्रता की 100वीं वर्षगांठ मना रहा था। इस वजह से वहां की सरकार ने विशेष रूप से फुटबॉल विश्व कप की मेजबानी करने की अपील की। साल 1924 और साल 1928 के ओलंपिक में उरुग्वे ने लगातार स्वर्ण पदक जीता और इसी कारण यह खेल वहां बेहद लोकप्रिय हुआ।

इसके अलावा, उरुग्वे का राष्ट्रीय फुटबॉल महासंघ हिस्सा लेने वाली सभी टीमों के लिए यात्रा और उनके रहने के खर्च सहित सभी लागतों को उठाने के लिए तैयार भी था। वहीं, उरुग्वे ने किसी भी संभावित लाभ को साझा करने की बात कही, जबकि किसी भी तरह के नुकसान को भी उरुग्वे उठाने को तैयार था। साल 1929 के बार्सिलोना फीफा कांग्रेस में, उरुग्वे को आधिकारिक तौर पर फीफा विश्व कप के पहले मेजबान देश के रूप में चुना गया।

उरुग्वे में आयोजित 1930 फीफा विश्व कप के लिए कोई क्वालीफायर नहीं था। इसका मतलब यह था कि यह एक आमंत्रण टूर्नामेंट बन गया जिसमें प्रत्येक फीफा से संबद्ध कोई भी देश खेलने के लिए आमंत्रित था। फीफा विश्व कप के इतिहास में यह पहली और आखिरी बार था जब कोई क्वालीफायर नहीं हुआ।

चुनौतियां

एक तरफ अर्जेंटीना, ब्राजील, बोलीविया, चिली, मैक्सिको, पराग्वे, पेरू और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसी उत्तर और दक्षिण अमेरिकी टीमें इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उत्सुक थीं। वहीं, दूसरी तरफ उरुग्वे की वित्तीय प्रतिबद्धताओं के बावजूद यूरोपीय टीमों को प्रतियोगिता में शामिल करना एक बड़ा मुद्दा बन गया।

दरअसल, किसी भी यूरोपीय टीम ने फरवरी 1930 की अंतिम तारीख तक प्रतियोगिता में शामिल होने का आमंत्रण स्वीकार नहीं किया था। इसका सबसे बड़ा कारण उस समय की महामंदी थी जिसके कारण दुनिया भर में काफी आर्थिक कठिनाइयां चल रहीं थी। बहुत कम खिलाड़ी इतने लंबे समय के लिए इतनी दूरी की यात्रा करने के लिए इच्छुक थे। उन्हें डर था कि उनके पास जो भी नियमित आय का स्रोत है, वह खो जाएगा।

तत्कालीन फीफा अध्यक्ष जूल्स रिमेट ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और व्यक्तिगत रूप से फ्रांस (जो उनका गृह देश था) और यूगोस्लाविया को अपनी टीम भेजने के लिए तैयार कर लिया। जर्मन-बेल्जियम फीफा के उपाध्यक्ष रोडोल्फे सीलड्रेयर्स ने बेल्जियम को आश्वस्त किया और उन्हें प्रतियोगिता में हिस्सा लने के लिए मनाया।

रोमानिया के तत्कालीन नए राजा कैरोल II के प्रयासों के बाद रोमानिया भी विश्व कप में शामिल होने के लिए तैयार हो गया। कहा जाता है कि कैरोल II ने व्यक्तिगत रूप से रोमानिया की टीम का चयन किया था। उन्होंने खिलाड़ियों के नियोक्ताओं के साथ बातचीत की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि घर वापसी के बाद भी उनकी नौकरी खतरे में नहीं होगी।

इन सभी टीमों के आने के बाद, पहला फीफा विश्व कप मेजबान उरुग्वे के अलावा अर्जेंटीना, ब्राजील, बोलीविया, चिली, मैक्सिको, पराग्वे, पेरू, यूएसए, फ्रांस, बेल्जियम, रोमानिया और यूगोस्लाविया के साथ 13-टीमों वाला एक प्रतियोगिता हुआ।

यूरोपीय टीमों ने उरुग्वे पहुंचने के लिए जहाज से लंबी यात्राएं की।

फीफा विश्व कप 1930 के वेन्यू

फीफा विश्व कप के पहले संस्करण का आयोजन पूरी तरह से उरुग्वे की राजधानी मोंटेवीडियो में किया गया था। यहां तीन स्टेडियम - एस्टाडियो सेंटेनारियो, एस्टाडियो पोकिटोस और एस्टाडियो ग्रान पार्क सेंट्रल थे, जिसने मैचों की मेजबानी की।

उरुग्वे की स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष के उत्सव के रूप में बनाया गया 90,000 दर्शकों की क्षमता वाला एस्टाडियो सेंटेनारियो, उद्घाटन फीफा विश्व कप के आयोजन का मुख्य स्थल था।

जूल्स रिमेट ने एस्टाडियो सेंटेनारियो को 'फुटबॉल के मंदिर' के रूप में संदर्भित किया है। इस स्टेडियम ने फीफा विश्व कप 1930 के 18 मैचों में से 10 मैचों की मेजबानी की थी, जिसमें सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबले भी शामिल थे।

फीफा विश्व कप 1930 प्रतियोगिता का फॉर्मेट

फीफा विश्व कप 1930 में भाग लेने वाली 13 टीमों को चार ग्रुप में बांटा गया था।

ग्रुप 1 में चार टीमें थीं जबकि अन्य तीन ग्रुप में में तीन-तीन टीमों को रखा गया था। प्रत्येक ग्रुप में, टीमों ने एक बार राउंड-रॉबिन प्रारूप में एक-दूसरे के साथ मुकाबला खेला। यहां से चारों ग्रुप के विजेताओं ने ने सेमीफाइनल में प्रवेश किया।

फीफा विश्व कप 1930 के ग्रुप:

ग्रुप 1: अर्जेंटीना, चिली, फ्रांस, मेक्सिको

ग्रुप 2: युगोस्लाविया, ब्राजील, बोलीविया

ग्रुप 3: उरुग्वे, रोमानिया, पेरू

ग्रुप 4: यूएसए, पराग्वे, बेल्जियम

पहले फीफा विश्व कप में किसने जीत दर्ज की

अर्जेंटीना, युगोस्लाविया, उरुग्वे और संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएसए) ने अपने-अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान हासिल किया और नॉकआउट दौर में जगह बनाई।

संयोग से, अर्जेंटीना और उरुग्वे दोनों ने क्रमशः युगोस्लाविया और यूएसए को समान रूप से 6-1 के बड़े अंतर से हराकर पहले फीफा विश्व कप के फाइनल मुकाबले की नींव रखी।

प्रतियोगिता का फाइनल मुकाबला बेहद रोमांचक और हाई-वोल्टेज मुकाबला था क्योंकि दोनों पड़ोसी देशों के बीच की फुटबॉल प्रतिद्वंद्विता पहले से ही जगजाहिर थी। इस फाइनल मुकाबले से दो साल पहले, उरुग्वे की पुरुष फुटबॉल टीम ने अर्जेंटीना को 1928 के ओलंपिक में 2-1 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया था। पहला मैच 1-1 की बराबरी पर खत्म हुआ था।

अर्जेंटीना के हजारों फुटबॉल प्रेमी रियो डी ला प्लाटा नदी को छोटे नावों से पार कर फाइनल मुकाबला देखने पहुंचे ताकि वे अपनी टीम को साल 1928 के एम्सटर्डम ओलंपिक की दर्दनाक हार का बदला लेते हुए देख सकें।

इस दौरान मैच के दिन मोंटेवीडियो की सड़कों पर अर्जेंटीना के प्रशंसकों द्वारा विक्टोरिया ओ मुएर्टे (जीत या मृत्यु) का नारा जोर-शोर से चला। 93,000 से अधिक प्रशंसक फाइनल मैच देखने के लिए एस्टाडियो सेंटेनारियो तक पहुंच गए और स्टेडियम को खचाखच भर दिया।

मैच से पहले इस बात को लेकर बहस छिड़ गई कि कौन सी टीम आधिकारिक मैच बॉल मुहैया कराएगी। इस मामले में भी फीफा अध्यक्ष जूल्स रिमेट ने हस्तक्षेप किया और यह फैसला हुआ कि मैच के पहले हाफ के लिए अर्जेंटीना गेंद उपलब्ध कराएगा जबकि मैच के दूसरे हाफ के लिए उरुग्वे की टीम की गेंद का इस्तेमाल किया जाएगा।

इन सबके बाद मैच और भी अधिक रोमांचक और नाटकीय साबित हुआ। 

मैच में 12 मिनट गुजरने के बाद, पाब्लो डोराडो ने मैदान के दाएं ओर से एक कम ऊंचाई का शॉट लिया और गोल करते हुए अपनी घरेलू टीम को बढ़त दिला दी। हालांकि, इसके ठीक 8 मिनट बाद अर्जेंटीना के विंगर कार्लोस प्यूसेले ने अपने एक शक्तिशाली शॉट से उरुग्वे के गोलकीपर एनरिक बैलेस्ट्रेरो को चकमा दिया और स्कोर को 1-1 से बराबर कर दिया। 

रोमांचक मुकाबले के 37वें मिनट में गिलर्मो स्टेबिल ने एक गोल कर हाफ टाइम होने से पहले अर्जेंटीना को 2-1 से आगे कर दिया। 

हालांकि, घरेलू टीम ने दूसरे हाफ में वापसी की और पेड्रो सी ने मैच में एक घंटा पूरा होने तक एक शानदार गोल के साथ अपनी टीम को 2-2 से बराबरी के स्कोर पर ला दिया। सैंटोस इरिआर्ट ने 68वें मिनट में गोल करके उरुग्वे को मैच में पहली बार बढ़त दिलाई और हेक्टर कास्त्रो ने एक और गोल करते हुए स्कोर को 4-2 कर दिया। इसके साथ ही कास्त्रो ने अपनी टीम की जीत और ट्रॉफी पर मुहर लगा दी और मैच खत्म होने में सिर्फ एक मिनट का समय बाकी रह गया था। 

इस तरह, उरुग्वे 1930 में पहला फीफा विश्व कप विजेता बन गया। रिमेट ने उरुग्वे फुटबॉल एसोसिएशन के प्रमुख राउल जूड को ट्रॉफी प्रदान की और बाद में उनके सम्मान में इस ट्रॉफी का नाम बदलकर जूल्स रिमेट ट्रॉफी कर दिया गया। 

इस ऐतिहासिक जीत के उपलक्ष्य में 31 जुलाई को उरुग्वे में राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया गया था।

फीफा विश्व कप 1930 के रिकॉर्ड्स

फीफा विश्व कप में पहले दो मैच - फ्रांस और मैक्सिको के बीच एक ग्रुप 1 का मैच और संयुक्त राज्य अमेरिका और बेल्जियम के बीच ग्रुप 4 का पहला मुकाबला - 13 जुलाई को एक ही साथ खेला गया था। 

फ्रांस ने एस्टाडियो पोकिटोस में अपना मैच 4-1 के अंतर से जीता। फ्रांस के स्ट्राइकर लुसिएन लॉरेंट ने फीफा विश्व कप के इतिहास में पहला गोल मेक्सिको के खिलाफ अपने 19वें मिनट में किया।

लॉरेंट ने संयुक्त राज्य अमेरिका के बार्ट मैकघी को केवल चार मिनट से पीछे छोड़ते हुए यह रिकॉर्ड बनाया। अमेरिकी खिलाड़ी ने 23 वें मिनट में एस्टाडियो पार्क सेंट्रल में अपनी टीम के लिए पहला गोल किया।

हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपना मैच 3-0 से जीता। इसके साथ ही उनके गोलकीपर जिमी डगलस फीफा विश्व कप में क्लीन शीट (विरोधी टीम को कोई गोल नहीं करने देना) रखने वाले पहले गोलकीपर बन गए।

चार दिन बाद, 17 जुलाई को, संयुक्त राज्य अमेरिका के बर्ट पेटेनौड फीफा विश्व कप में हैट्रिक बनाने वाले पहले खिलाड़ी बन गए, जब उन्होंने एस्टाडियो पार्क सेंट्रल में पराग्वे के खिलाफ एक और 3-0 की अंतर से जीत में टीम की ओर से तीनों गोल दागे।

मैच में पेटेनौड का दूसरा गोल वर्षों तक विवाद का कारण बना रहा, और अक्सर इस गोल के लिए उनकी टीम के साथी टॉम फ्लोरी को श्रेय दिया जाता था या ऑरेलियो गोंजालेज द्वारा आत्मघाती गोल के रूप में माना जाता था। हालांकि, फीफा ने 2006 में इस मामले में स्पष्ट फैसला देते हुए पेटेनौड को इस रिकॉर्ड से सम्मानित किया।

अर्जेंटीना के गिलर्मो स्टेबिल (बनाम मेक्सिको) और उरुग्वे के पेड्रो सी (बनाम यूगोस्लाविया) ने भी टूर्नामेंट में हैट्रिक बनाई।

वास्तव में, गिलर्मो स्टेबिल आठ गोल के साथ टूर्नामेंट में शीर्ष स्कोरर रहे, जबकि पेड्रो ने पांच गोल किए।

उरुग्वे के कोच अल्बर्टो होरासियो सप्पीसी ने जब 1930 फीफा विश्व कप खिताब के लिए अपनी टीम का नेतृत्व किया तब वे सिर्फ 31 वर्ष के थे। फुटबॉल विश्व कप जीतने वाले सबसे कम उम्र के कोच होने का रिकॉर्ड अब तक उनके नाम पर दर्ज है।

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