ग्रीको रोमन रेसलिंग: नियम से लेकर दांव और स्कोर से इतिहास तक की विस्तार से जानकारी

ग्रीको रोमन रेसलिंग ओलंपिक गेम्स के सबसे पुराने और सफल स्पर्धाओं में से एक है।

लेखक जतिन ऋषि राज
Wrestling Greco-Roman

1896 गेम्स से शुरुआत करने वाला सपोर्ट ‘ग्रीको रोमन रेसलिंग’ ने दुनिया भर में अपने प्रशंसक कर लिए हैं। एक ऐसा खेल जिसमे, तीव्रता, जोश और ताकर का इस्तेमाल होता है और एक खिलाड़ी को लगातार अपने प्रतिद्वंदी पर हावी होना होता है।

1908 ओलंपिक गेम्स के बाद ग्रीको रोमन रेसलिंग को ओलंपिक में रेगुलर कर दिया गया है और इसमें खिलाड़ी भी बढ़ चढ़ के हिस्सा लेने लगे। इतना ही नहीं इसी के जैसे खेल यानी ‘फ्रीस्टाइल रेसलिंग’ ने भी 1920 के बाद से अपनी एक अलग जगह बना ली थी।

1908 गेम्स के बाद से ग्रीको रोमन रेसलिंग को रेगुलर कर दिया गया।

ग्रीको रोमन रेसलिंग को 3 मिनट के दो हाफ में बांटा गया है। इन दोनों भागों के बीच में खिलाड़ियों को 30 सेकंड का ब्रेक मिलता है जिसमें वह रणनीति भी बनाते हैं और आराम भी करते हैं। गौरतलब है कि रेसलर ब्लॉक, होल्ड, थ्रो और टेकडाउन के तहत अंक बटोर सकता है।

प्वाइंट्स रिवर्सल के ज़रिए भी अर्जित किया जा सकता है - अपने प्रतिद्वंदी के ख़िलाफ़ रक्षात्मक स्थिति से गेम को कंट्रोल करना - या अगर प्रतिद्वंदी पहलवान कोई ग़लती करता है तो परिणामस्वरूप अंक मिल सकता है।

एक खिलाड़ी को एक मूव के सबसे अधिक 5 अंक मिलते हैं। इसे बटोरने का तरीका वह होता है जब एक पहलवान दूसरे पहलवान की पीठ कुछ सेकंड के लिए मैट पर लगा देता है। इस मूव में पहले एक पहलवान अपने प्रतिद्वंदी को उठाता है और फिर पीठ के बल उसे पटकता है और फिर उसपर काबू करता है।

ग्रीको रोमन के नियम और स्कोरिंग

एमेच्योर कुश्ती की तरह ही ग्रीको रोमन वर्ग में भी एक खिलाड़ी को जीत के लिए अपने प्रतिद्वंदी के दोनों कंधों को मैट पर लगाना होता है या एक निर्धारित समय में उससे ज़्यादा अंक लेने होते हैं। यदि कोई भी पहलवान इन दोनों में से किसी एक भी विधि को सफलता पूर्वक करता है तो वह मुकाबला जीत जाता है।
अंक रिवर्सल यानी डिफ़ेंस से भी बटोरी जा सकते हैं। दोनों राउंड के स्कोर को मिलाकर जिस भी खिलाड़ी का स्कोर अधिक होता है वह मुकाबला जीत जाता है।

अगर कोई भी मुकाबला टाई हो जाता है तो 3 मुद्दों को नज़र में लाकर मुकाबले का निर्णय निकाला जा सकता है और वह हैं – 1) हाईएस्ट वैल्यू यानी एक मूव सबसे अधिक अंक देने वाला, 2) सबसे से कम चेतावनी प्राप्त करना 3) टेक्निकल अंक की मदद से।

इस वजह से ग्रीको रोमन पहलवानों को अपने ऊपरी शरीर का इस्तेमाल कर अंक बटोरने होते हैं और वह इसी पर ज़्यादा निर्भर भी करते हैं।

पूर्व वर्ल्ड रेसलिंग चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीत चुकेएडम कून (Adam Koon) ने यूएसए की वेबसाईट को बताया “ग्रीको रोमन में ऊपरी शरीर और पोजिशनिंग का महत्व है। आप अपने पिछवाड़े (हिप्स) को अपने प्रतिद्वंदी के पिछवाड़े से नीचे रखते हो ताकि आपको थ्रो में मदद मिल सके और साथ ही आपको बेहतर ‘सेंटर ऑफ़ ग्रेविटी’ भी मिल सके।”

दोनों ही खिलाड़ी एक दूसरे के सामने खड़े होते हैं और अपनी थ्रो को पक्का बनाते हैं ताकि वह टेकडाउन में आसानी होके।

मुकाबले को ‘पिन’ कर ए भी जीता जाता है। इस विधि में एक पहलवान को अपने प्रतिद्वंदी को कंधों के बल को मैट पर 1 से 2 सेकंड के लिए गिराकर पिन करना होता है। अगर ऐसा होता है तो उसी समय मुकाबले का नतीजा निकाला जाता है और एक खिलाड़ी विजयी बन जाता है।

ग्रीको रोमन रेसलिंग में टेक्निकल सुपीरियारोटी के तहत निर्णय निकाला जाता है। इसमें यदि एक पहलवान ने दूसरे पहलवान के बीच 8 अंक की बढ़त लेली तो वह मुकाबला जीत जाएगा।

इसके अलावा भी नतीजे निकाले जा सकते हैं और वह हैं – एक पहलवान का डिसक्वालिफाई, चोटिल होना या उसे वॉक ओवर मिलना।

ग्रीको रोमन रेसलिंग की तकनीक

ग्रीको रोमनरेसलिंग और फ्रीस्टाइल रेसलिंग के अंक बटोरने के तरीके और स्कोरिंग लगभग बराबर है लेकिन कुछ तकनीकें हैं जिनकी वजह से इन दोनों खेलो को एक दूसरे से अलग भी माना जाता है।

ग्रीको रोमन और फ्रीस्टाइल रेसलिंग में जो सबसे बड़ा अंतर है वह है कि ग्रीको रोमन में एक पहलवान अपने प्रत्द्वंदी को कमर से नीचे अपने हाथ का इस्तेमाल कर पकड़ नहीं सकता। दूसरा जो एक कारण है जो इन दोनों खेलों को अलग करता है वह है कि ग्रीको रोमन रेसलर अपनी टांगों से ना अटैक कर सकते हैं और न ही डिफ़ेंस।

जहां एक फ्रीस्टाइल रेसलर दांव पर निर्भर करता है तो वहीं एक ग्रीको रोमन अपनी पोज़ीशन पर आकर थ्रो से अंक बटोरने की कोशिश करता है।

ग्रीको रोमन रेसलिंग में जब टांगों का इस्तेमाल करना निषिद्ध है तो ऐसे में फ़ाउल के मौके भी बढ़ जाते हैं। अगर कोई भी पहलवान ग्रीको रोमन में कोई भी मूव चलाता है और गलती से उसमें उसकी टांगों का प्रयोग होता है तो वह फ़ाउल करार दिया जाता है।

अटैक के समय अगर एक खिलाड़ी का पाँव या टांगों का इस्तेमाल होता है तो उसे वार्निंग यानी चेतावनी मिलती है और अगर वह दोबारा वही गलती करता है तो उसके प्रतिद्वंदी को 1 अतिरिक्त अंक मिल जाता है।

मानों अगर डिफ़ेंस के समय एक पहलवान लेग फ़ाउल करता है तो बिना किसी चेतावनी के उसके प्रतिद्वंदी को 2 अंक मिल जाते हैं और यहां पर कई दफा खेल को भी बदलते हुए देखा गया है। सही शब्दों में कहें तो फ्रीस्टाइल रेसलिंग में खिलाड़ियों के पास ज़्यादा आज़ादी होती है और ग्रीको रोमन रेसलिंग में खिलाड़ियों को ज़रा संभलकर अंक बटोरने होते हैं।।

ज़्यादा डिफेंसिव खेलने से होता है फ़ाउल

ग्रीको रोमन में सहनशीलता या ज़्यादा डिफेंसिव खेल के प्रदर्शन का भी एल अलग ही महत्व है। फ्रीस्टाइल रेसलिंग में अगर एक पहलवान ज़्यादा डिफेंसिव खेल दिखाता है तो उसे पहले चीतावनी दी जाती है और अगर वह दोबारा ऐसा करता है तो उसे 30 सेकंड का समय दिया जाता है जहां दोनों खिलाड़ियों में से एक को अंक अर्जित करना ज़रूरी होता है।

वहीं ग्रीको रोमन रेसलिंग में अगर एक पहलवान ज़्यादा डिफेंसिव खेल का मुज़ाहिरा करता है तो उसके प्रतिद्वंदी (एक्टिव रेसलर) को सीधा एक अंक मिल जाता है इसके साथ-साथ ही उसका प्रत्द्वंदी यानी एक्टिव रेसलर खड़े खड़े या par terre पोज़ीशन में आकर खेल को दोबारा शुरू करता है जो कि अपने आप में ही लाभदायक है।

par terre पोज़ीशन में डिफेंसिव खेल रहा रेसलर मैट पर अपे पेट के बल लेट जाता है और अपने हाथों और टांगों को खोल लेता है और साथ ही उन्हें मैट पर लगने भी नहीं देता है।

ऐसे में एक्टिव रेसलर डिफेंसिव या पैसिव रेसलर को अपनी पसंदीदा पोज़ीशन में लाने की कोशिश करता है ताकि उसे और अधिक अंक मिल सके।

ओलंपिक इतिहास में ग्रीको रोमन

1896 ओलंपिक गेम्स से शुरुआत करने वाली ग्रीको रोमन रेसलिंग को 1908 ओलंपिक गेम्स का रेगुलर स्पोर्ट कर दिया गया। ग्रीको रोमन को ओलंपिक गेम्स में सिर्फ पुरुषों द्वारा खेला जाता था।

यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग (United World Wrestling – UWW_ यानी इंटरनेशनल रेसलिंग फेडरेशन की मानें तो पहला संस्करण जर्मनी के कार्ल शूमैन (Carl Schuman) द्वारा जीता गया था।

ग्रीको रोमन में par terre पोज़ीशन एक्टिव रेसलर के लिए लाभदायक है 

1896 गेम्स को अपने नाम करने के बाद कार्ल शूमैन ने उसी एथेंस में ही जिम्नास्टिक्स में और तीन मेडल हासिल किए। उस समय विजेताओं को सिल्वर मेडल के साथ ओलिव ब्रांच भी भेंट में दी जाती थी। गौरतलब है कि गोल्ड मेडल का दौर 1904 से आया था।

ओलंपिक गेम्स में ग्रीको रोमन रेसलिंग का हिस्सा पूर्व सोवियत यूनिउन, बुल्गारिया, टर्की, रोमानिया, स्वीडन, फिनलैंड, जापान और साउथ कोरिया रहे थे और वहीं से इस खेल ने सभी के दिलों को छू लिया था। 

टोक्यो 2020 के लिए ग्रीको रोमन रेसलिंग को 6 भारवर्गों में बांटा गया है और वह हैं -  60 किग्रा, 67 किग्रा, 77 किग्रा, 87 किग्रा, 97 किग्रा, 130 किग्रा।

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