जैनब हुसैनी: रिकॉर्ड-ब्रेकिंग पूर्व शरणार्थी स्केटबोर्डिंग के माध्यम से दूसरों की ऐसे कर रही हैं मदद

इस बार के अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस को दुनिया में विकास और शांति की स्थापना के लिए मनाया जा रहा है। इस खास मौके पर हम हुसैनी की प्रेरित करने वाली यात्रा पर नजर डाल रहे हैं। जानें कैसे स्केटिस्तान के माध्यम से वह अफगानिस्तान में शरणार्थियों और महिलाओं के लिए माैके बढ़ाने के लिए काम कर रही हैं।

लेखक ओलंपिक चैनल

बतौर शरणार्थी ईरान में पैदा हुईं जैनब हुसैनी को इस बात का अनुभव है कि मौके की कमी से कैसा महसूस होता है।

लेकिन उनके रास्ते में आईं विषम परिस्थितियां भी उन्हें खेल का आनंद लेने से नहीं रोक सकीं। दृढ़ संकल्प और दृढ़ता के माध्यम से वह एक धावक के रूप में अपने बेहतरीन करियर का आनंद लेते हुए आगे बढ़ती गईं।

अपने संघर्षों से सीखकर उन्होंने अन्य महिलाओं और शरणार्थियों को खेल में आने के लिए न सिर्फ प्रेरित करती हैं, बल्कि उनकी खूब मदद भी करती हैं। इसी के चलते वह अफगानिस्तान में स्केटिस्तान की कंट्री मैनेजर बनी हैं।

ये एनजीओ दुनिया भर में बच्चों को स्केटबोर्डिंग और शिक्षा से जोड़ने का काम कर रहा है। जिसमें हुसैनी की भूमिका अफगानिस्तान की अगली पीढ़ी को स्कूल पहुंचाने और खेलों से जोड़ने में मदद करना है।

अंतरराष्ट्रीय खेल दिवस इस बार विकास और शांति को ध्यान में रखकर मनाया जा रहा है। इसलिए हम इस पर बेहद करीबी नजर डालते हुए, उन बातों को रेखांकित कर रहे हैं, कि कैसे खेल के माध्यम से अधिक सकारात्मक और आनंदमय जीवन हो सकता है और इससे कैसे अवसरों को बढ़ाया जा सकता है।

स्केटिस्तान दुनिया भर के जरूरतमंद बच्चों को स्केटिंग सीखने के अवसर प्रदान करता है।

ईरान में एक शरणार्थी के रूप में पैदा होने के बावजूद हुसैनी अपने स्कूल बास्केटबॉल टीम की सदस्य रहीं।

लेकिन उन्हें कम उम्र में इस खेल को छोड़ना पड़ा था. क्योंकि टीम के पास स्पोर्ट्स क्लब में पंजीकृत होने के लिए आवश्यक कानूनी दस्तावेज नहीं थे।

अंत में अपने देश अफगानिस्तान लौट आईं, हालांकि यहां स्थिति में सुधार नहीं हुआ। उनके परिवार के पास पानी या बिजली नहीं थी और वह ताइक्वांडो सीखना चाहती थीं, लेकिन पुलिस ने लड़कियों के सत्र चलाने वाले उस क्लब को ही बंद करवा दिया।

मार्च 2021 में Olympics.com से बात करते हुए हुसैनी ने बताया, “पुलिस ने उस क्लब में हमें अभ्यास करने से रोक दिया, जिसमें पुरुष भी आते थे। उनका मानना था कि महिला और पुरुष एक ही स्पोर्ट्स क्लब में प्रैक्टिस नहीं कर सकते हैं। ”

लेकिन हुसैनी ने हिम्मत नहीं हारी और वह अपनी हाई स्कूल की बॉस्केटबॉल टीम से जुड़ गईं, जहां महिलाओं को बराबर मौके मिल रहे थे।

वह आगे कहती हैं, "हमारे पास न तो खेल के सभी सामान थे, यहां तक कि हमारे पास खेलने के लिए मैदान भी नहीं था। इसके बावजूद हमने कठिन मेहनत की और कंप्टीशन में भाग लिया। मैंने कई स्पोर्ट्स में भी हाथ अजमाया और यही वजह है कि आज मैं मैराथन रनर हूं।"

साल 2015 में युवा एथलीट अफगानिस्तान की मैराथन दौड़ने वाली पहली अफगान महिला बनीं और बाद में एक अल्ट्रामैराथन पूरा करने वाली पहली अफगान महिला बनीं। उन्होंने ये सब तब हासिल किया जब मजार-ए-शरीफ की सड़कों पर ट्रेनिंग के दौरान हमेशा असुरक्षा का माहौल बना रहता था।

हुसैनी के लिए दूसरों की मदद करना हमेशा उतना ही महत्वपूर्ण था जितना कि खुद खेल का आनंद लेना। 

उन्होंने अफगानिस्तान में वीमेन फॉर वुमन इंटरनेशनल के साथ काम करना शुरू किया, लेकिन एक बार जब वह अनुबंध समाप्त हो गया, तो उन्हें नहीं पता था कि आगे क्या करना है। तभी स्केटिस्तान उनकी जिंदगी में आया।

“मैं नौकरी की वेबसाइटों पर खोज कर रही थी और मैंने देखा कि स्केटिस्तान को एक स्पोर्ट्स कॉआर्डिनेटर की जरूरत थी। मैंने आवेदन किया और अपनी खेल पृष्ठभूमि के चलते इसमें सफल हो गई। दो से तीन वर्षों के बाद फ्री टू रन नामक एक संगठन ने स्केटिस्तान से अल्ट्रामैराथन प्रतियोगिता में कुछ महिला उम्मीदवारों को भाग लेने के लिए कहा।

"यह हमारे लिए नई यात्रा की शुरुआत थी। हमें ट्रेनिंग के लिए दौड़ने की जगह खोजने में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। हमारे पास सुरक्षा नहीं थी और हम दूसरे देशों के एथलीटों की तरह सड़कों पर नहीं दौड़ सकते थे। हमें अपने छोटे-छोटे घर के बगीचों के आसपास दौड़ना पड़ता था। हमने प्रशिक्षण के लिए सड़कों पर लौटने की कोशिश की, लेकिन यह बहुत खतरनाक था। हमने महसूस किया कि अफगानिस्तान अभी तक सार्वजनिक रूप से खेल खेलने वाली महिलाओं को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, इसलिए हमारे घर हमारे लिए सबसे सुरक्षित स्थान थे।

"आखिरकार हमने कई अलग-अलग देशों के अन्य प्रतिभागियों के साथ अल्ट्रामैराथन रेस पूरी की और अफगानिस्तान उन देशों की सूची में शामिल हो गया, जिन्होंने अल्ट्रामैराथन पूरा किया है।"

साल 2020 में स्केटिस्तान ने हुसैनी के गृहनगर बामयान, जो मध्य अफगानिस्तान में है में एक नया स्कूल खोलने का फैसला किया। सत्ता परिवर्तन के दौरान इस शहर को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा था। उद्घाटन समारोह में 300 से अधिक बच्चों ने भाग लिया।

उस वर्ष के बाद में आईओसी महिला और खेल पुरस्कारों में स्केटिस्तान के प्रेरक कार्यों के लिए आईओसी वूमेन और स्पोर्ट्स अवार्ड में वर्ल्ड विनर अवार्ड से सम्मानित किया।

स्केटिज्म से बात करते हुए उन्होंने बताया "हमारा उद्देश्य स्थानीय लोगों को सशक्त बनाना और भविष्य के लीडर को तैयार करना है। प्रत्येक स्केट और क्रिएट क्लास में छात्रों के पास खुद को सेफ्टी लीडर या मेंबर ऑफ द स्टूडेंट काउंसिल में नॉमिनेट करने का मौका होता है।"

फिर चुने गए छात्रों को युवा नेतृत्व कार्यक्रम में शामिल होने का अवसर दिया जाता है और छह महीने के प्रशिक्षण के बाद वे अपनी जानकारी को स्केट या क्लास में बतौर शिक्षक इस्तेमाल कर सकते हैं।

खेल और शिक्षा के माध्यम से हुसैनी कई युवाओं के जीवन को बेहतर बनाने में मदद कर रही हैं। लेकिन वह उन सीमाओं को तोड़ना चाहती हैं और उनके मन में प्रेरित करने का लक्ष्य है।

Olympics.com से बात करते हुए उन्होंने आगे कहा, " मैं वास्तव में चाहती हूं कि अफगानिस्तान में सभी बच्चे स्कूल में होंगे।"

“आंतरिक रूप से विस्थापित बच्चे हैं जो अपने प्रांतों से भागने के लिए मजबूर हैं और वे स्कूल नहीं जा सकते। क्योंकि वे पहली कक्षा में प्रवेश करने की उम्र से अधिक हैं या उनके पास पब्लिक स्कूलों में पंजीकृत होने के लिए दस्तावेज नहीं हैं। यहीं से स्केटिस्तान का समर्थन और योगदान शुरू होता है, जो छात्र यहां आ सकते हैं और एक साल तक सीख सकते हैं, और फिर हम उन्हें दोबारा से स्कूल में प्रवेश करने के लिए कानूनी मदद प्रदान करते हैं।"

"स्केटबोर्डिंग हमारे सभी छात्रों के लिए एक पुरस्कार है। हम उन्हें कक्षाओं में पढ़ाते हैं... और फिर हम उन्हें प्रत्येक सत्र के बाद एक घंटे की स्केटबोर्डिंग में शामिल होने के लिए कहते हैं। स्केटबोर्डिंग अफगानिस्तान में लड़कियों के लिए सबसे बड़ा खेल बन गया है और यह सब इन मौकों की वजह से है कि बच्चे विशेष रूप से लड़कियों को स्केटिस्तान के साथ सुरक्षित स्थान पर अभ्यास करने का मौका मिला है।"

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