गामा पहलवान: भारतीय कुश्ती का अजेय दिग्गज, जिन्होंने ब्रूस ली को किया प्रेरित 

1878 में अविभाजित भारत के अमृतसर में जन्मे गामा को सबसे महान पहलवान में गिना जाता है।

लेखक मनोज तिवारी
फोटो क्रेडिट 2004 Getty Images

भारतीय और विश्व कुश्ती में द ग्रेट गामा या गामा पहलवान समान रूप से एक बड़ा और मशहूर नाम है।

पांच दशक के लंबे करियर में गामा ने तकरीबन 5000 से अधिक मुकाबले लड़े, जिसमें वह कभी नहीं हारे। उन्हें भारतीय कुश्ती का सबसे महान पहलवान कहा जाता है।

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जो तकरीबन 1,200 किलो का है, माना जाता है कि महान गुलाम मोहम्मद ने इसे उठाया था। जिन्हें 'गामा पहलवान' के नाम से जाना जाता है। 23 दिसंबर, 1902 को 22 साल की उम्र में वह इसे अपने सीने तक उठाकर काफी दूर तक घूमे थे। वह अपने जीवन में अजेय रहे और उन्हें अब तक के सबसे महान पहलवान के रूप में माना जाता है।

शोध से पता चलता है कि गामा केवल 5 फुट 7 इंच के थे और उनका वजन लगभग 250 पाउंड जो लगभग 115 किलोग्राम था।

ग्रेट गामा पहलवान कौन थे?

22 मई, 1878 को जन्मे गुलाम मोहम्मद बख्श बट को बाद में गामा पहलवान के नाम से जाना जाने लगा। वो पहलवानों के एक कश्मीरी परिवार से ताल्लुक रखते थे। ब्रिटिश शासन काल के दौरान अविभाजित भारत के पंजाब के अमृतसर जिले के जब्बोवाल गांव में उनका जन्म हुआ था।

अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण गामा अखाड़ों या पारंपरिक कुश्ती को सीखते हुए बड़े हुए और बहुत कम उम्र से ही ताकत की ट्रेनिंग और कुश्ती की ओर उनका झुकाव हो गया। अपने समुदाय के कई अन्य लोगों की तरह वह भी पहलवानी करने लगे, लेकिन वह बेहद खास थे।

संभवतः उनके कई अविश्वसनीय कारनामों का पहला विवरण 1888 में मिलता है। उस वक्त गामा ने राजस्थान के जोधपुर में स्ट्रॉन्गमैन प्रतियोगिता में भाग लिया था। इस कार्यक्रम में 400 से अधिक पहलवानों और ताकतवर लोगों ने हिस्सा लिया था। जिनमें से कई तो राष्ट्रीय स्तर पर मशहूर थे, लेकिन गामा तब 10 वर्ष के थे। इसलिए द ग्रेट गामा इस शो के मुख्य आकर्षण थे।

कम उम्र होने के बावजूद गामा शीर्ष 15 विजेताओं में शामिल थे और अंत में उनकी उम्र को देखते हुए जोधपुर के महाराजा ने उन्हें विजेता घोषित कर दिया था। यहां पुरस्कार राशि के साथ ही गामा को दतिया के तत्कालीन महाराजा और पटियाला के महाराजा का संरक्षण भी मिला, जिन्होंने गामा के प्रशिक्षण का खर्च उठाया।

गामा पहलवान डाइट

गुलाम के पोते और खुद एक प्रसिद्ध पहलवान नासिर भोलू ने बाद में गामा पहलवान की डाइट और प्रशिक्षण का संक्षिप्त विवरण दिया था। कथित तौर पर वह रोजाना 15 लीटर दूध, तीन किलोग्राम मक्खन, मटन, नौ किलोग्राम बादाम और तीन टोकरी फलों का सेवन करते थे।

गामा पहलवान के दैनिक प्रशिक्षण में 40 से अधिक पहलवानों के साथ 5,000 सिट-अप, 3,000 पुश-अप और कुश्ती करना शामिल था।

लेखक जॉन लिटिल की पुस्तक ब्रूस ली: द आर्ट ऑफ एक्सप्रेसिंग द ह्यूमन बॉडी के मुताबिक मार्शल आर्ट के जादूगर ब्रूस ली ने बाद में गामा के प्रशिक्षण के तरीकों से प्रेरणा ली और उनकी कई चीज़ों को अपने आहार में शामिल किया। यह पुस्तक ब्रूस ली के आइकन के अपने नोट्स और रिकॉर्ड पर आधारित है, जिसमें शारीरिक कौशल के निर्माण के दृष्टिकोण का जिक्र किया गया है।

अपनी युवा अवस्था में ही गामा पहलवान ने भारत के हर पहलवान को हरा दिया था। 1895 में वह रहीम बख्श सुल्तानी वाला से भिड़े, जो एक अन्य कश्मीरी पहलवान थे और तत्कालीन रुस्तम-ए-हिंद और निर्विवाद भारतीय कुश्ती चैंपियन थे।

अधिक अनुभवी और 7 फीट से अधिक लंबे रहीम बख्श 17 वर्षीय गामा पहलवान के सामने सबके पसंदीदा थे। लेकिन युवा गामा ने नाक और कान से बहुत खून बहने के बावजूद अपने बहुचर्चित प्रतिद्वंद्वी को दबाव में रखा और एक के बाद एक जबरदस्त बाउट लड़ी।

गामा पहलवान: लंदन में विश्व चैंपियन

गामा को अभी तक रुस्तम-ए-हिंद घोषित नहीं किया गया था, लेकिन बख्श के खिलाफ उनके प्रदर्शन के बाद उन्हें खिताब के प्राथमिक दावेदार के रूप में मान्यता दी गई थी। 1910 तक, गामा ने रहीम बख्श को छोड़कर सभी प्रतिष्ठित भारतीय पहलवानों को पछाड़ दिया और उसके बाद उनका ध्यान विश्व मंच पर था।

भारतीय पहलवान ने एक अंतरराष्ट्रीय इवेंट में हिस्सा लेने के लिए लंदन की यात्रा की, लेकिन उनके छोटे कद की वजह से उन्हें इसमें हिस्सा लेने से रोक दिया गया। गुस्सा होकर गामा पहलवान ने एक खुली चुनौती दे दी कि वह किसी भी भार वर्ग के किन्हीं तीन पहलवानों को 30 मिनट में हरा सकता है। हालांकि, किसी ने भी भारतीय पहलवान की बात को गंभीरता से नहीं लिया।

काफी लंबे इंतजार के बाद आखिरकार गामा को एक लोकप्रिय अमेरिकी पहलवान 'डॉक्टर' बेंजामिन रोलर से एक चुनौती मिली, जो एक डॉक्टर और एक पेशेवर फुटबॉल (अमेरिकी) खिलाड़ी भी थे। गामा ने रोलर को दो बार चित किया - पहली बाउट में एक मिनट 40 सेकेंड लिया और दूसरे बाउट में नौ मिनट और 10 सेकेंड लिया।

इस जीत ने गामा पहलवान को एक वैध प्रतियोगी के रूप में स्थापित किया और उन्होंने अगले ही दिन एक के बाद एक 12 पहलवानों को हराया।

गामा के सामने इस दौरे की पहली बड़ी चुनौती पोलैंड के विश्व चैंपियन स्टैनिस्लॉस ज़बीस्ज़्को थे, जिन्होंने 10 सितंबर, 1910 को जॉन बुल बेल्ट और £250 की पुरस्कार राशि के लिए फाइनल में भारतीय पहलवान का सामना किया। मैच में एक मिनट बीतने के साथ ही गामा ने ज़बीस्ज़्को को पटकनी दे दी लेकिन पोल ने ड्रॉ करने के लिए लगभग तीन घंटे तक मैट पर अपनी रक्षात्मक स्थिति बनाए रखी।

ज़बीस्ज़्को ने किसी भी प्रशंसक का दिल तो नहीं जीता, लेकिन उन्हें उन बहुत कम पहलवानों में से एक बना दिया जिन्होंने एक आधिकारिक मैच में दिग्गज गामा पहलवान को रोकने में सफलता हासिल की। दोनों को सात दिन बाद फिर से मैच के लिए उतरते हुए देखा गया, लेकिन पोल इसमें कुछ खास नहीं कर पाए और गामा को जॉन बुल बेल्ट और विश्व चैंपियन का टैग दिया गया।

ज़बीस्ज़को 1927 में पटियाला में गामा से एक फॉलो-अप मुकाबले में भिड़े, लेकिन एक मिनट से भी कम समय में हार गए। पोल ने मुकाबले के बाद गामा पहलवान को एक टाइगर का नाम दिया।

स्विट्जरलैंड के मौरिस डेरियाज़ और स्विट्जरलैंड के जोहान लेम, तत्कालीन यूरोपीय चैंपियन और स्वीडन के जेसी पीटरसन, एक अन्य विश्व चैंपियन जैसे प्रमुख पहलवान भी ग्रेट गामा के हाथों हार गए, क्योंकि उन्होंने विश्व मंच पर अपना प्रभुत्व बढ़ाया।

गामा ने जापानी जूडो चैंपियन तारो मियाके, रूसी पहलवान जॉर्ज हैकेन्सचिमिड्ट और अमेरिकी महान फ्रैंक गॉच को भी खुली चुनौती दी थी, जिनमें से सभी ने उस समय विश्व चैंपियन के खिताब का दावा किया था, लेकिन किसी ने भी रिंग में दिग्गज गामा पहलवान का सामना करने के निमंत्रण को स्वीकार नहीं किया।

1910 में अपने अंग्रेजी प्रवास के तुरंत बाद गामा भारत लौट आए और भारतीय चैंपियन के खिताब के लिए फिर से रहीम बख्श सुल्तानी वाला का सामना किया। हालांकि रहीम बख्श उस समय उम्रदराज थे, उन्होंने एक कांटे की टक्कर दी, लेकिन अंततः गामा घंटों के संघर्ष के बाद शीर्ष पर रहे।

कई विश्व चैंपियन पहलवानों को हराने के बावजूद, गामा ने कहा कि बख्श सबसे कड़े प्रतिद्वंद्वी रहे, जिनका उन्होंने कुश्ती रिंग में सामना किया था।

फरवरी 1929 में, गामा ने जेसी पीटरसन को हराया। यह उनके करियर का अंतिम रिकॉर्ड किया गया मुकाबला था। हालांकि उस समय 51 उम्र से अधिक, यह प्रतिद्वंद्वियों की कमी थी जिसने गामा के करियर को समाप्त कर दिया। क्योंकि रेसलिंग रिंग के अंदर कोई उनका सामना ही नहीं करना चाहता था।

कुश्ती रिंग के बाहर भी गामा पहलवान ने लड़ी महान लड़ाई

साल 1947 में भारत का विभाजन हुआ और गामा ने पाकिस्तान के लाहौर में जाने का फैसला किया।

वह लाहौर के मोहनी रोड में सेटल हुए थे, जहां हिंदू आबादी उस वक्त तक ठीक-ठाक थी। लेकिन विभाजन के दौर में दोनों देशों में हिंदू-मुस्लिम दंगा भड़क गया था। उस समय गामा ने अपने पड़ोसी हिंदूओं को दंगाईयों से बचाया था।

वह और उनके साथी पहलवान उस अशांत समय के दौरान पड़ोस में गश्त करते थे और यहां तक ​​कि कथित तौर पर कई मौकों पर सशस्त्र भीड़ से भी लड़ते थे। कई वृत्तांत इस बात की पुष्टि करते हैं कि गामा ने एक बार ऐसे ही दंगों के एक गिरोह के नेता को थप्पड़ जड़ दिया था और आने वाली भीड़ पर मुस्कुराए थे, जिससे वे डर के मारे भाग गए।

हालांकि, जैसे-जैसे स्थिति बिगड़ती गई, गामा को पता चल गया था कि अपने पड़ोसियों की रक्षा करने की उसकी क्षमता सीमित होती जा रही है।

इसलिए, गामा ने अगला सबसे अच्छा काम ये किया कि व्यक्तिगत रूप से कई लोगों को सुरक्षित सीमा तक ले गए। उन्होंने सारा खर्च भी वहन किया और सभी को एक हफ्ते का राशन मुहैया कराया।

गामा पहलवान की मृत्यृ कैसे हुई

गामा को अपने जीवन के आखिरी दिनों में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा और उन्हें सरकार से भी बहुत कम सहयोग मिला। उनके पांच बेटे और चार बेटियां थी। दुर्भाग्य की बात ये थी कि उनके सभी बेटों की कम उम्र में ही मौत हो गई थी। 23 मई साल 1960 में 82 वर्ष की उम्र में लंबी बीमारी के बाद गामा पहलवान का देहांत हो गया।

उनके 144वें जन्मदिन के मौके पर गूगल ने रेसलिंग आइकन को गूगल डूडल बनाकर याद किया। गूगल वैश्विक घटनाओं, छुट्टियों, वर्षगांठ और प्रसिद्ध हस्तियों के जीवन का जश्न मनाने के लिए सर्च इंजन के अपने आधिकारिक होम पेज पर डूडल बनाकर याद करता है।

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