कौन हैं देवेंद्र झाझरिया: भारत के डबल पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता के बारे में ये बातें हर किसी को जाननी चाहिए

जैवलिन थ्रोअर ने एथेंस 2004 पैरालंपिक में पहली बार स्वर्ण पदक हासिल किया था।  

लेखक शिखा राजपूत
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डबल पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता देवेंद्र झाझरिया ने असफलताओं को अपनी कामयाबी के रास्ते में कभी आने नहीं दिया। उन्होंने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाकर पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल कायम की है और सभी को प्रेरित किया है। F46 कैटेगरी में जैवलिन थ्रो करने वाले एथलीट ने पैरालंपिक में पदक जीतकर भारत को गौरवान्वित किया है।

देवेंद्र झांझरिया ने दो बार पैरालंपिक 2004 और 2016 में स्वर्ण पदक जीता है। इसके बाद उन्होंने टोक्यो 2020 पैरालंपिक में रजत पदक जीतकर अपनी मेडल लिस्ट में एक और पदक जोड़ लिया। बता दें कि पैरालंपिक खेलों में एथलेटिक्स का पहला स्वर्ण पदक जैवलिन थ्रो में ही हासिल किया गया था, जिसे 2004 पैरालंपिक में देवेंद्र झांझरिया ने ही जीता था।

 देवेंद्र झाझरिया 
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देवेंद्र झाझरिया से जुड़ी खास बातें

देवेंद्र झाझरिया को इन पुरस्कारों से नवाजा गया

झाझरिया के बेहतरीन प्रदर्शन और भारत को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए कई बड़े पुरस्कार दिए गए हैं। उन्हें अर्जुन अवॉर्ड (2004), पद्मश्री (2012), FICCI पैरा-स्पोर्ट्सपर्सन ऑफ द ईयर (2014), मेजर ध्यानचंद खेल रत्न (2017) और पद्मभूषण (2022) से सम्मानित किया जा चुका है।

एक हादसे ने बदल दी उनकी जिंदगी

वास्तव में झाझरिया जन्म से विकलांग नहीं थे। बल्कि वह एक होनहार बच्चे थे, जो हमेशा अपने गांव राजस्थान के चुरू में शरारतें किया रहते थे। लेकिन आठ साल की उम्र में उनके साथ एक भयानक हादसा हो गया और उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। जब वह एक पेड़ पर चढ़ रहे थे, तभी उन्होंने गलती से एक 11000 वोल्ट की लाइव केबल को छू लिया, जो एक डाल में फंसी हुई थी।

देवेंद्र ने ईएसपीएन को बताया, "ग्रामीणों ने उन्हें पेड़ से उतरने में मदद की, तब मुझे लग रहा था कि मैं मर गया हूं।" इस हादसे के बाद डॉक्टरों को उनके बाएं हाथ को काटना पड़ा और इसके बाद झांझरिया का जीवन पूरी तरह बदल गया। 10 जून 1981 को जन्में देवेंद्र ने हाथ गंवाने के बाद भी खेल के प्रति अपना लगाव कम नहीं होने दिया।

जैवलिन को चुनकर बनाई अपनी पहचान

इस हादसे के बाद झाझरिया को यह समझने में बिल्कुल भी देर नहीं लगी कि इसके बाद उनकी जिंदगी पहले जैसी नहीं रही। उन्हें समझ आ गया था कि अस्पताल से घर लौटने के बाद वह अपने दोस्तों के साथ पहले जैसा मेल-जोल नहीं रख सकते थे। न ही उनके साथ खेल सकते थे। जैसा वह दुर्घटना से पहले खेला करते थे। लेकिन इस स्थिति ने उनके मनोबल को जरा भी प्रभावित नहीं किया। वास्तव में इससे वह पहले से ज्यादा मजबूत हो गए।

उन्होंने ईएसपीएन को बताया, "अन्य बच्चे मुझे एक मुसीबत मानते हुए मेरे साथ खेलना नहीं चाहते थे, इसलिए मैंने एक खास स्पोर्ट खेलने और उनसे बेहतर होने का फैसला किया।"

तब झाझरिया ने स्कूल से जैवलिन थ्रो की शुरुआत की और इस स्पोर्ट का हिस्सा बन गए। देवेंद्र जैवलिन थ्रो का अभ्यास लकड़ी के भाले से किया करते थे। क्योंकि इनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। उन्होंने स्कूली शिक्षा के दौरान ही पदक जीतना शुरू कर दिया।

इसके बाद साल 1997 में एक पैरा-एथलेटिक्स प्रतियोगिता में कोच रिपुदमन सिंह ने उनकी प्रतिभा को देखा और उन्हें खेल को गंभीरता से लेने के लिए कहा।

पहली बार जीता पदक

देवेंद्र ने पहली बार 1995 में नेशनल पैरा एथलीट खेलों में हिस्सा लिया और अपना पहला पदक जीता था। इसके बाद उन्होंने कई पदक जीते। साल 2002 में दक्षिण कोरिया में FESPIC खेलों में उन्होंने अपना पहला स्वर्ण पदक हासिल किया था। 2002 में वह पहली बार इंटरनेशनल स्पोर्ट इवेंट का हिस्सा बने थे।

एथेंस 2004 के बाद करना‌ पड़ा लंबा इंतजार

वैसे तो झाझरिया ने कई पदक जीते, लेकिन उनको 2004 पैरालंपिक ने विश्वव्यापी पहचान दिलाई। इंटरनेशनल इवेंट में अच्छा प्रदर्शन करने वाले झांझरिया ने 23 साल की उम्र में एथेंस 2004 पैरालंपिक के लिए क्वालीफाई किया। उन्होंने 62.15 मीटर का विश्व रिकॉर्ड थ्रो करते हुए F46 जैवलिन में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने अपने 59.77 मीटर के पुराने रिकॉर्ड को तोड़ा।

लेकिन इसके बाद उन्हें रिकॉर्ड तोड़ प्रदर्शन करने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा। पैरालंपिक में फिर से अपनी छाप छोड़ने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। उनकी इवेंट कैटेगरी F46 में बीजिंग 2008 और लंदन 2012 पैरालंपिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं की गई। यह कैटेगरी एकतरफा अंग में नुकसान होने वाले एथलीटों के लिए है, जो एक हाथ के कंधे और कोहनी के जोड़ पर प्रभाव डालते हैं।

रियो 2016 पैरालंपिक के लिए एक और पैरालंपिक स्वर्ण पदक को जीतने की कोशिश करने के लिए उन्हें 12 साल का लंबा इंतजार करना पड़ा। बता दें कि रियो 2016 पैरालंपिक में इस कैटेगरी को फिर से शामिल किया गया।

पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय

उन्होंने रियो 2016 में एक और पैरालंपिक स्वर्ण पदक हासिल किया। और अपने ही 2004 पैरालंपिक में बनाए गए रिकॉर्ड को 63.97 मीटर के थ्रो के साथ तोड़ दिया। उन्होंने पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले और एकमात्र भारतीय बनने का गौरव हासिल किया। और देश में सबसे कामयाब पैरालंपियनों में अपना नाम दर्ज कराया।

देवेंद्र झाझरिया आगामी पेरिस 2024 पैरालंपिक में प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयारी कर रहे हैं। वह पैरालंपिक में स्वर्ण पदक जीतने और अपनी मेडल लिस्ट में एक और पदक जोड़ने की कोशिश करेंगे।

खासतौर से डिजाइन किया गया डंब-बेल प्रशिक्षण

झाझरिया अपनी बाहों को मजबूत करने के लिए खासतौर से डंब बेल ट्रेनिंग करते हैं। द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ. सत्यपाल सिंह ने अपने प्रशिक्षण को इस तरह से डिजाइन किया है कि यह सिर्फ एकतरफा मजबूती प्रदान नहीं करता है, बल्कि उनके फंक्शनल दाहिने हाथ को बहुत मजबूत बना देता है, जबकि बांया दुर्घटनाग्रस्त हाथ कमजोर रहता है।

देवेंद्र को प्रशिक्षण देने वाले डॉ सत्यपाल सिंह ने ईएसपीएन को बताया, "बेसिक वेट ट्रेनिंग और विशेष रूप से फ्री वेट बाहों को मजबूत करने में काफी सहायता प्रदान करते हैं। हालांकि, इसे आमतौर पर दोनों हाथों का उपयोग करके किया जाता है, लेकिन इस मामले में हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।"

उन्होंने बताया,, "हम अक्सर डंब-बेल्स ट्रेनिंग का इस्तेमाल करते हैं: फंक्शनल दाहिने हाथ के साथ काम करते समय एक डंब-बेल को एक पट्टी के साथ दुर्घटनाग्रस्त हाथ पर बांध देते हैं।"

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