कौन हैं टोक्यो 2020 में पदक से चूकने वाले युवा पहलवान दीपक पुनिया

पुनिया गुरुवार को पुरुष फ्रीस्टाइल 86 किग्रा वर्ग में कांस्य पदक मैच हार गए।

लेखक भारत शर्मा

उदीयमान भारतीय पहलवान दीपक पुनिया गुरुवार को ओलंपिक पदक जीतने से चूक गए। 22 वर्षीय अपने ओलंपिक पदार्पण पर टोक्यो 2020 में पुरुषों के फ्रीस्टाइल 86 किग्रा मैच में सैन मैरिनो के माइल्स अमीन के खिलाफ अपना कांस्य पदक मुकाबला 2-4 से हार गए।

पुनिया 2-1 की मामूली बढ़त का बचाव करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन उनके प्रतिद्वंद्वी ने जीत को छीनने के लिए बाउट के अंतिम क्षणों में उलटफेर कर दिया। इस फैसले को भारत ने चुनौती दी थी, लेकिन निर्णायकों ने फैसला अमीन के पक्ष में देते हुए उन्हें विजेता घोषित कर दिया। इसके बाद पूनिया के पास मुकाबले को आगे बढ़ाने के लिए समय नहीं बचा।

निर्णायकों के इस फैसले ने 2019 विश्व चैंपियनशिप के रजत पदक विजेता पूनिया का टोक्यो 2020 में दुखद अंत कर दिया। *आइए जानते हैं युवा पहलवान पूनिया के बारे में कुछ अहम बातें। *

दीपक पूनिया उन तीन पहलवानों में से एक हैं जो कोरोना पॉज़िटिव पाए गए हैं।

हरियाणा के अखाड़ों से शुरुआत

पुनिया हरियाणा के चररा गांव में पले-बढ़े हैं, जहां 60 साल से भी अधिक पुराने अखाड़े (कुश्ती के मैदान) हैं। हरियाणा में कुश्ती सबसे प्रमुख खेल है और लोगों में इसकी खासी लोकप्रियता है। 

पांच साल की उम्र में जहां अधिकतर बच्चे सही तरह से चलना सीख रहे होते हैं, वहीं पूनिया ने एक अखाड़े में कुश्ती का शुरुआती प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया था। राज्य के डेयरी किसान उनके पिता सुभाष ने हमेशा ही पूनिया को आगे बढ़ाने के लिए उनका समर्थन किया। 

उनके पिता ने ESPN से कहा, "यहां कुश्ती का जुनून है। मैं उसे खतरों के लिए ले जाता था।"

अपने गृहनगर में 'केटली' उपनाम से मशहूर से पूनिया

पूनिया अपने गृहनगर में 'केटली' (केतली) उपनाम से मशहूर हैं। इसके पीछे भी एक रोचक किस्सा है। उनके एक दोस्त ने पहले बताया था कि पांच साल की उम्र में उन्हें एक गिलास मीठा दूध पीने की पेशकश के बाद केतली का उपनाम दिया गया था। इस ऑफर के बाद वह एक के बाद एक कई गिलास दूध पी गए। 

इसी के कारण उन्हें पहली बार 'केटली' (यह लड़का केटली है) कहा जाने लगा।

वीरेंद्र सिंह ने उन्हें प्रसिद्ध छत्रसाल स्टेडियम में प्रशिक्षण की पेशकश की

पूनिया का शुरुआत से ही पहलवान बनना तय हो गया था। वह उन पहलवानों को चुनौती देते थे जो उनके वजन से 20 या 30 किलोग्राम ऊपर थे और उन्हें स्थानीय दंगल (टूर्नामेंट) में हरा देते थे। वह राज्य के सभी क्षेत्रों में कुश्ती करते थे और छोटी उम्र से ही उन्होंने इससे पैसा कमाना शुरू कर दिया था। 

इन राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में से एक के दौरान भारत में कुश्ती के घर छत्रासाल स्टेडियम के कोच वीरेंद्र सिंह ने उन्हें नई दिल्ली में प्रशिक्षित करने की पेशकश की थी और कोच ने एक बार फिर देखा कि पूनिया को सफल होने के लिए प्रेरित किया गया था।

कोच ने ESPN को बताया, "छत्रसाल आने वाले अधिकांश बच्चे उतना ही प्रशिक्षण लेते हैं जितना आप उन्हें बताते हैं। जब कोई बच्चा कहता है कि मैं और क्या काम कर सकता हूं, तो आपको लगता है कि उसके पास सफल होने का जुनून है।"

चोट से जूझने के बाद जूनियर विश्व चैम्पियनशिप का स्वर्ण

सफल होने की उनकी भूख इतनी स्पष्ट थी कि उन्होंने अपने बाएं हाथ के अंगूठे में चोट के साथ जूनियर विश्व चैंपियनशिप में कुश्ती लड़ी। डॉक्टरों ने उन्हें सर्जरी के लिए जाने की सलाह दी थी, लेकिन उन्होंने इस चैंपियनशिप के लिए प्रशिक्षण रोकने से इनकार कर दिया।

इसके बाद दीपक ने टूर्नामेंट में स्वर्ण पदक जीता, लेकिन अपने अंगूठे को बचाने की कोशिश में उनका कंधा चोटिल हो गया। यह उन उदाहरणों में से एक था जब दीपक ने बड़े मंच पर अपने दृढ़ संकल्प का प्रदर्शन किया।

बीजिंग 2008 रजत पदक विजेता द्वारा प्रशिक्षित

टोक्यो 2020 में पुनिया की सफलता का श्रेय उनके बेलारूसी कोच मुराद गेदारोव को दिया जा सकता है। उन्होंने अक्टूबर 2019 में बीजिंग 2008 के रजत पदक विजेता के तहत प्रशिक्षण शुरू किया था।

उनके मार्गदर्शन में ही पूनिया ने एशियाई चैंपियनशिप में एक रजत और दो कांस्य पदक जीते।