अचिंता शेउली के शून्य से शिखर तक पहुंचने की कहानी, जानिए वे कैसे बने कॉमनवेल्थ गेम्स वेटलिफ्टिंग चैंपियन

राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता ने अपने बड़े भाई की कुर्बानियों और उनकी मदद से वेटलिफ्टिंग के शिखर तक पहुंचने के लिए कई निजी परेशानियों और और वित्तीय कठिनाइयों को पार किया।

लेखक रौशन प्रकाश वर्मा
फोटो क्रेडिट Getty Images

भारतीय भारोत्तोलक अचिंता शेउली ने बर्मिंघम में हुए राष्ट्रमंडल खेल 2022 में पुरुषों के 73 किग्रा भार वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया। इस उपलब्धि को पाने के लिए उन्होंने गेम रिकॉर्ड बनाते हुए कुल 313 किग्रा का भार उठाया। 

उनकी ये सफलता एक दिन में नहीं आई बल्कि यह कई वर्षों की कड़ी मेहनत का परिणाम था। हालांकि, वेटलिफ्टिंग अचिंता शेउली के लिए स्वाभाविक नहीं था। 

अचिंता ने कहा, "आपको जीवन में एक लक्ष्य रखने की आवश्यकता है। कई लोग लड़कियों को आकर्षित करने के लिए जिम जाना पसंद करते हैं। लेकिन, मैं लड़ना चाहता था (भारोत्तोलन में एक उपलब्धि हासिल करने के लिए), क्योंकि मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत अच्छी नहीं थी।"

जीवन के लिए कड़ा संघर्ष

अचिंता शेउली का जन्म 24 नवंबर 2001 को हुआ था। उनका पालन-पोषण कोलकाता से कुछ घंटों की दूरी पर बसे एक शहर देउलपुर में हुआ। उनके बड़े भाई आलोक एक भारोत्तोलक थे, जिन्होंने एक शर्मीले नौजवान का परिचय इस खेल से करवाया ताकि वह थोड़ा बोल्ड बन सकें।

9 साल की उम्र में अचिंता ने कई स्थानीय टूर्नामेंट जीते लेकिन वह कभी भी आम लोगों से अलग नहीं दिखे और इस खेल में उनकी कोई विशेष रुचि नहीं थी। साल 2013 में, उनके मजदूर पिता का निधन हो गया जिनकी आय से परिवार की जीविका चलती थी।

शुरुआत में, अचिंता की मां पूर्णिमा ने परिवार को चलाने के लिए दो जगहों पर काम किया। हालांकि, जब उनके बड़े भाई आलोक ने यह महसूस किया कि यह परिवार के लिए पर्याप्त नहीं था, तब उन्होंने भी  काम करना शुरू कर दिया। इसके बाद युवा अचिंता ने भी काम करना शुरू कर दिया ताकि परिवार को एक दिन में दो वक्त के भोजन के लिए तकलीफ न उठानी पड़े।

तीनों ने मिलकर कोलकाता में महिलाओं के कपड़ों के लिए कढ़ाई का काम किया। इसमें दस्तकारी विशेषज्ञता, डिजाइन और विस्तार पर ध्यान देने की आवश्यकता थी जो मशीनों से कर पाना संभव नहीं था।

उस वक्त अचिंता के बड़े भाई आलोक ने परिवार की मदद के लिए अपना भारोत्तोलन का करियर छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने अचिंता को इस स्थिति से निकलकर भारोत्तोलन को अपने करियर के रुप में चुनने के लिए प्रेरित किया।

आलोक ने स्पोर्टस्टार से बातचीत में कहा, "मैंने सोचा कि वह इस खेल के साथ अपने लिए एक बेहतरीन भविष्य बना सकता है। मुझे पता था कि लोगों को इसके माध्यम से नौकरी मिल सकती है। मैं उससे कहता था कि हमारे पास कुछ नहीं है। यह खेल ही एकमात्र ऐसी चीज है जिसके माध्यम से हम कुछ हासिल कर सकते हैं।" 

उन्होंने कहा, "अगर आप अच्छा खेलते हैं तो आप अपना नाम बना सकते हैं। यदि आप कड़ी मेहनत करते हैं और प्रदर्शन करते हैं, तो लोग याद रखेंगे कि आप कौन हैं।"

उनके कोच अस्तम दास ने भी उनकी काफी मदद की, जो उनके परिवार के करीबी थे। अस्तम, अक्सर अचिंता के लिए भोजन और उपकरण उपलब्ध कराते थे, जब वह इसके लिए असमर्थ होते थे।

12 साल के बच्चे के रूप में अचिंता शेउली की दिनचर्या बेहद सख्त थी। वह सुबह कढ़ाई का काम करते थे, और फिर एक प्रशिक्षण सत्र पूरा करते थे। इसके बाद वे स्कूल जाते थे जिसके बाद वे एक और प्रशिक्षण सत्र पूरा करते थे।  दिन के अंत में वह फिर कढ़ाई का काम से करते थे।

अचिंता शेउली जिस मौके की तलाश कर रहे थे वह उन्हें साल 2014 में मिला।

आवास और भार वर्ग में बदलाव

2014 के जूनियर नेशनल प्रतियोगिता में, अचिंता शेउली चौथे स्थान पर रहे। हालांकि, उन्होंने पदक नहीं जीता, लेकिन पुणे के सेना खेल संस्थान के एक कोच ने उनकी प्रतिभा को देखा और उन्हें वहां प्रशिक्षण लेने के लिए आमंत्रित किया।

सुव्यवस्थित प्रशिक्षण और आहार योजना ने अचिंता को उत्साहित किया। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने 2015 यूथ नेशनल गेम्स में कांस्य पदक जीता। इसी वर्ष समोआ में आयोजित यूथ कॉमनवेल्थ गेम्स में अचिंता ने रजत पदक हासिल किया। बेहतर पोषण की मदद से उन्हें अपने शरीर का विकास करने में मदद मिली और वह 50 किग्रा भार वर्ग से भी आगे बढ़े। 

वह साल 2018 में राष्ट्रीय शिविर में शामिल हुए और लगातार पदक जीतते रहे। अचिंता ने उज्बेकिस्तान के ताशकंद में आयोजित 2018 एशियाई युवा चैंपियनशिप में रजत पदक जीता और समोआ में हुए 2019 राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में जूनियर और सीनियर दोनों श्रेणियों में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। 

इस बीच अचिंता शेउली भारतीय सेना में हवलदार भी बने जिसके कारण उनके परिवार का वित्तीय बोझ भी कम हुआ।  नई दिल्ली में हुए 2018 खेलो इंडिया यूथ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतने के बाद उन्हें हर महीने स्टाइपेंड भी मिलने लगा।

अचिंता शेउली साल 2019 में 73 किग्रा भार वर्ग में राष्ट्रीय चैंपियन का खिताब हासिल किया और बर्मिंघम में आयोजित 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने के प्रबल दावेदार के रूप में सामने आए। l

अचिंता शेउली ने ताशकंद में आयोजित 2021 राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप में एक और स्वर्ण पदक के साथ अपना जोरदार प्रदर्शन जारी रखा। वहीं, साल 2021 में जेद्दा में रजत पदक जीतने के साथ ही वह जूनियर विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने वाले पहले भारतीय एथलीट भी बन गए। 

अचिंता के करियर की सबसे शानदार उपलब्धि 1 अगस्त, 2022 को सामने आई। इस दिन उन्होंने रिकॉर्ड कायम करते हुए 313 किग्रा (स्नैच में 143 किग्रा और क्लीन एंड जर्क में 170 किग्रा) का भार उठाकर अपने पहले कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक हासिल किया। स्नैच में 143 किग्रा का भार उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ व्यक्तिगत प्रदर्शन था।

अब उनकी निगाहें इस साल के अंत में होने वाली विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने पर होंगी। इसके बाद उनके सामने पेरिस 2024 में एक बड़ी चुनौती होगी जब अचिंता एक अन्य विलक्षण भारतीय वेटलिफ्टर - जेरेमी लालरिनुंगा के साथ ओलंपिक के लिए भारतीय दल का हिस्सा बनने के लिए तैयार होंगे।


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