(Getty Images)
पिछले डेढ़ दशक में रेपेचेज खेलों में एक बहुत ही परिचित शब्द बन गया है।
यह फ्रांसीसी शब्द रेपेचेर से लिया गया है, जिसका मतलब है कि मछली पकड़ना या रेस्क्यू करना है। आमतौर पर रेपेचेज उन प्रतियोगियों के लिए एक दूसरे मौके के रूप में होता है, जो प्रतियोगिता में बने रहने के लिए क्वालीफाइंग कट-ऑफ को पूरा करने में असफल रहे। ओलंपिक गेम्स में, रेपेचेज ज्यादातर कुश्ती में शामिल किया जाता है।
रेपेचेज का उपयोग पहली बार ओलंपिक में कुश्ती में किया गया था, जब बीजिंग 2008 में डायरेक्ट नॉकआउट फॉर्मेट पेश किया गया था। तब से यह फ्रीस्टाइल और ग्रीको-रोमन कुश्ती दोनों का हिस्सा रहा है।
ओलंपिक कुश्ती स्पर्धाओं में रेपेचेज के माध्यम से दो कांस्य पदक दिए जाते हैं। रेपेचेज सिस्टम का उपयोग दुनिया भर में हर प्रमुख कुश्ती प्रतियोगिता में भी किया जाता है, जब तक कि किसी विशेष डिवीज़न में सात या उससे कम प्रतिस्पर्धी न हों और नॉर्डिक सिस्टम का पालन न किया जाए।
मान लीजिए कि पहलवान A और पहलवान B एक विशेष भार वर्ग के फाइनल में पहुंचते हैं।
इस सफर में, पहलवान A ने पहले राउंड में W को, दूसरे राउंड में X को, क्वार्टरफाइनल में Y को और अपने वर्ग के सेमीफाइनल में Z को हराया।
ऐसे में W, X, Y और Z के खिलाड़ी उस ब्रैकेट के लिए कांस्य पदक का फैसला करने के लिए रेपेचेज राउंड में प्रवेश करते हैं। रेपेचेज के पहले राउंड में W और X का आमना-सामना होगा और विजेता को रेपेचेज के दूसरे राउंड में Y के खिलाफ खेलना होगा। सेमीफाइनल में हारने वाला Z खिलाड़ी कांस्य पदक मैच में सीधे दूसरे राउंड के रेपेचेज विजेता से भिड़ता है।
इस ब्रैकेट में कांस्य पदक विजेता का फैसला करने के लिए भी इसी तरह के सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें पहलवान B ने फाइनल या स्वर्ण पदक मैच में जगह बनाई थी।
आपको बता दें कि कुश्ती में रेपेचेज किसी भी भार वर्ग में लागू होता है, जिसमें 16 से अधिक पहलवान प्रतिस्पर्धा करते हैं। ओलंपिक में कुश्ती की सभी स्पर्धाओं में 16 प्रतियोगी शामिल होते हैं।
यह सिस्टम यह सुनिश्चित करता है कि एक अच्छा पहलवान जो पहले राउंड में एक शीर्ष प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ ड्रॉ में हो सकता है, उसे मुश्किल ड्रॉ दिए जाने पर मौके के तौर पर उसे मेडल हासिल करने के लिए दूसरा मौका मिलता है।
भारत ने कुश्ती में सात ओलंपिक पदक जीते हैं, जिसमें से चार पदक रेपेचेज के माध्यम से जीते गए हैं। सुशील कुमार (बीजिंग 2008 में कांस्य), योगेश्वर दत्त (लंदन 2012 में कांस्य), साक्षी मलिक (रियो 2016 में कांस्य) और बजरंग पुनिया (टोक्यो 2020 में कांस्य) ने बखूबी अपने इस दूसरे मौके का फायदा उठाया है।
ताइक्वांडो और जूडो, दो अन्य ओलंपिक मार्शल आर्ट डिसिप्लिन में भी रेपेचेज का उपयोग किया जाता है। जबकि ताइक्वांडो में कुश्ती की तरह ही इस प्रणाली का उपयोग किया जाता है। वहीं, जूडो में बस कुछ ही बदलाव देखने को मिलता है जहां क्वार्टरफाइनल और सेमीफाइनल हारने वाले खिलाड़ी रेपेचेज राउंड में जाते हैं।
रेपेचेज का उपयोग अलग-अलग चीजों के लिए कई अन्य खेलों में भी किया जाता है।
रोइंग में, रेपेचेज उन रोवर्स या टीमों को आगे बढ़ने का दूसरा मौका देता है जो सीधे हीट के माध्यम से क्वार्टरफाइनल के लिए कट बनाने में असफल रहे हैं। ट्रैक साइकिलिंग में कीरिन और स्प्रिंट स्पर्धाओं में भी रेपेचेज राउंड का उपयोग किया जाता है।
हालांकि, कुश्ती, ताइक्वांडो या जूडो के विपरीत इसमें पदक तय करने में इसका प्रभाव कम होता है।
रग्बी यूनियन विश्व कप और रग्बी लीग विश्व कप के क्वालिफिकेशन के लिए भी रेपेचेज का उपयोग किया जाता है।
मेजर लीग बेसबॉल (MLB) वाइल्ड कार्ड सीरीज़ और NBA बास्केटबॉल सीज़न के प्ले-इन टूर्नामेंट भी अनिवार्य रूप से रेपेचेज सिस्टम का उपयोग करते हैं।
पेरिस 2024 ओलंपिक से एथलेटिक्स में रेपेचेज को शामिल किया जा रहा है। 200 मीटर से 1500 मीटर (हर्डल इवेंट भी शामिल है) तक सभी व्यक्तिगत एथलेटिक्स ट्रैक स्पर्धाओं में रेपेचेज राउंड भी जोड़े गए हैं।
नए रेपेचेज फॉर्मेट के तहत, जो एथलीट पहले राउंड की हीट में अपनी अंतिम स्थिति के आधार पर अगले राउंड के लिए कट नहीं कर पाते हैं, उनके पास रेपेचेज हीट में भाग लेकर सेमीफाइनल के लिए क्वालीफाई करने का दूसरा मौका होगा।
यह पहले सिस्टम की जगह लेगा, जहां एथलीट हीट में शीर्ष स्थान के अलावा सबसे तेज समय के माध्यम से आगे बढ़ते थे, जिन्हें कभी-कभी 'भाग्यशाली हारे हुए' के रूप में जाना जाता था।
इन 12 इवेंट (पुरुषों और महिलाओं की 200 मीटर, 400 मीटर, 800 मीटर, 1500 मीटर और 400 मीटर बाधा दौड़ के साथ-साथ पुरुषों की केवल 110 मीटर बाधा दौड़ और महिलाओं की केवल 100 मीटर बाधा दौड़) में अब चार राउंड शामिल होंगे, राउंड एक हीट, रेपेचेज राउंड, सेमीफाइनल और फाइनल शामिल होंगे। वहीं पिछले वर्ष तीन राउंड शामिल थे।
100 मीटर स्पर्धा में कोई रेपेचेज राउंड नहीं होगा क्योंकि स्पर्धा में पहले राउंड से पहले ही प्रीलिमिनरी हीट हो चुकी है। इसके अलावा लंबी दूरी की स्पर्धाओं में धावकों को राउंड के बीच रिकवरी टाइम देने के लिए रेपेचेज राउंड नहीं होंगे।