टोक्या 2020 की सफलता के बाद अपनी बायोपिक पर चर्चा कर रहे हैं पीआर श्रीजेश

अनुभवी भारतीय गोलकीपर ने टोक्यो 2020 के शानदार प्रदर्शन की बदौलत सर्वश्रेष्ठ पुरुष गोलकीपर का FIH प्लेयर ऑफ द ईयर पुरस्कार जीता।

लेखक दिनेश चंद शर्मा
फोटो क्रेडिट Alexander Hassenstein/ Getty Images

अनुभवी भारतीय गोलकीपर पीआर श्रीजेश का फील्ड हॉकी में करियर प्रेरणा से कम नहीं रहा है। तीन बार के ओलंपियन टोक्यो 2020 में भारत के लिए गोल पोस्ट में दीवार की तरह खड़े थे। इसके चलते भारत ने ओलंपिक में 41 सालों से चला आ रहा पदक का सूखा खत्म किया और पोडियम फिनिश हासिल करने में सफलता हासिल की।

33 वर्षीय श्रीजेश ने टोक्यो 2020 में भारत के लिए कम से कम 40 गोल बचाए और उनका सबसे निर्णायक योगदान जर्मनी के खिलाफ उनके कांस्य पदक प्लेऑफ मैच में आया। उन्होंने सात मिनट के अंतिम हूटर में मिले पेनल्टी कार्नर को बचा लिया और इससे भारत ने जर्मनी को 5-4 से हराकर अपना पोडियम स्थान पक्का कर दिया।

भारतीय हॉकी दिग्गज ने बाद में सर्वश्रेष्ठ पुरुष गोलकीपर के लिए FIH प्लेयर ऑफ द ईयर का पुरस्कार जीता और उन्हें मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया, जो देश का सर्वोच्च खेल सम्मान है।

इसके अलावा, उनकी जीवनी और भारत के लिए बड़े पैमाने पर योगदान को भी निकट भविष्य में एक बायोपिक के रूप में देखा जा सकता है।

श्रीजेश ने टाइम्स नाउ समिट 2021 में कहा, "हां, मुझसे एक बायोपिक के लिए संपर्क किया गया है और बातचीत चल रही है।"

केरल-स्टार ने टोक्यो 2020 में पोडियम पर पहुंचने से पहले अपने करियर में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। वह भारतीय टीम का हिस्सा थे, जो लंदन 2012 में एक भी मैच जीतने में नाकाम रही और रियो 2016 में क्वॉर्टर फाइनल में राष्ट्रीय टीम की कप्तानी की।

 भारतीय गोलकीपर पीआर श्रीजेश
फोटो क्रेडिट Alexander Hassenstein/ Getty Images

हालांकि, श्रीजेश मानते हैं कि टोक्यो 2020 में भारतीय टीम के शानदार प्रदर्शन के बाद लोगों की मानसिकता में बदलाव आया है। इसमें नीरज चोपड़ा ने ट्रैक और फील्ड में देश के लिए पहला स्वर्ण पदक जीता।

श्रीजेश का मानना है कि नीरज के स्वर्ण पदक जीतने के बाद ओलंपिक में हाल की जीत के बाद अब लोगों की सोच में बदलाव आया है। खेलों के प्रति लोगों के नजरिए में बदलाव आया है। लोगों ने भारतीय खिलाड़ियों में विश्वास दिखाना शुरू कर दिया है कि वे ओलंपिक खेल सकते हैं और पदक जीत सकते हैं।

हालांकि, उन्होंने भविष्य में देश के लोगों से भारत में खेल संस्कृति को बनाए रखने और विकसित करने का आग्रह किया है न कि इसे एक अस्थायी उत्सव बनाने के लिए।

उन्होंने कहा, "कोई भी इसे लंबे समय तक नहीं रखेगा। तो यह एक बड़ा मुद्दा है, अब भी माता-पिता केवल नौकरी की तलाश में हैं। इसलिए, वे केवल अपने बच्चों को कहते हैं कि वे कड़ी मेहनत से पढ़ाई करें और नौकरी करें। उन्हें अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं है और वो अपने पोषण के बारे में भी चिंतित नहीं हैं।"

उन्होंने आगे कहा, "ऐसा इसलिए होता है क्योंकि भारत में सिर्फ पढ़ने, नौकरी करने और बसने की संस्कृति है। शादी करो, बच्चे पैदा करो और फिर तुम उनकी देखभाल करो, लेकिन एक खेल संस्कृति की ओर देखना भी आपके जीवन का हिस्सा होना चाहिए। यहां तक ​​​​कि यहां बैठे बहुत कम लोग हैं जो सुबह उठते हैं और शाम को टहलने या व्यायायम के लिए जाते हैं।"

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