भारतीय इतिहास की पहली महिला शीतकालीन ओलंपिक खिलाड़ी Shailaja Kumar की अद्भुत कहानी

भारत के लिए इतिहास रचने वाली वरिष्ठ खिलाड़ी Shailaja Kumar ने 80 के दशक में वह कर दिखाया था जो उस वर्ष के बाद से सिर्फ कुछ ही महिला खिलाड़ियों ने किया है। पूर्व शीतकालीन ओलंपिक खिलाड़ी Shailaja Kumar ने olympics.com से बात करते हुए अपने खेल जीवन और स्कीइंग में भारत के भविष्य को लेकर बहुत कुछ कहा।

ओलंपिक खेल चाहे ग्रीष्मकालीन हों या शीतकालीन, भारतीय महिला खिलाड़ियों के लिए परिस्थितियां कठिन रही हैं और अगर आप 1950 से लेकर 1990 तक के समय को देखें तो बहुत कम महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंने विश्व के सबसे बड़े खेल मंच पर इस राष्ट्र के लिए सफलता पायी है। वर्ष 1988 के कैलगरी शीतकालीन ओलंपिक खेलों में भारत की ओर से तीन खिलाड़ियों ने भाग लिया था लेकिन उस वर्ष कुछ ऐसा हुआ जो पहले कभी नहीं हुआ था।

भारत के लिए 1988 से पहले शीतकालीन ओलंपिक खेलों में किसी भी महिला ने भाग नहीं लिया था लेकिन अल्पाइन स्कीयर Shailaja Kumar ने इतिहास के पन्नों में अपना नाम लिखते हुए इस घटना क्रम का अंत कर दिया। आज लगभग 34 वर्ष बाद भी वह शीतकालीन खेलों से जुड़ी हुई हैं, उन्हें स्कीइंग से उतना ही प्रेम है और वह खिलाड़ियों को बढ़ावा दे रही हैं।

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अमेरिका के सैन डिएगो में रहने वाली Shailaja Kumari का जन्म वर्ष 1967 में दार्जीलिंग में हुआ और उनके पिता हिमालयन माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट के प्राध्यापक थे। अद्भुत बात यह है कि क्योंकि उनका जन्म पहाड़ों में हुआ, Shailaja के नाम का आधार भी पहाड़ ही थे क्योंकि इस शब्द का अर्थ 'पहाड़ों की बेटी' होता है। माउंटेनियरिंग इंस्टिट्यूट के करीब जन्मी Shailaja को शायद को आभास नहीं था कि पहाड़ और बर्फ उनके जीवन का एक अटूट हिस्सा बन जायेंगे।

एक खास बातचीत में उन्होंने olympics.com को बताया, "पहाड़ मेरे लिए घर समान थे और शायद जिस आयु से मैंने चलना सीखा, उसी समय मैंने स्कीइंग भी सीख ली। यह मेरा सौभाग्य था कि मेरे पिता के पास वह समय और जूनून था कि हमें शीतकालीन खेलों में भाग लेने के लिए प्रेरित कर सकें। मैं चार वर्ष की आयु से स्कीइंग कर रही हूँ। जब मैं बड़ी हुई तो गुलमर्ग में स्थित स्की केंद्र जाने लगी और वहीँ से मैंने इस खेल को अपना जूनून बना लिया।"

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बहुत ही कम आयु में स्कीइंग को अपना लेने वाली Shailaja के लिए यह खेल न प्रतियोगिता और न ही किसी व्यवसाय के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण था। उनके मन में बस एक ही चीज़ थी - शीतकालीन खेलों से प्रेम और स्कीइंग का जूनून। इतना ही नहीं, जिस समय वह बड़ी हो रही थी, भारत में शीतकालीन खेलों को लेकर न कोई चर्चा होती थी और न ही कोई संवाद। इस बात में अगर उनका महिला खिलाड़ी होना जोड़ दें तो स्थिति का अंदाज़ा कोई भी बड़ी सरलता से लगा सकता है।

अपने पिता से प्रेरित Shailaja के अंदर दृढ निश्चय था और उनके लिए स्कीइंग करना अथवा पहाड़ों में जाना जीवन जीने का एक तरीका था।

उनके जीवन में एक बहुत बड़ा क्षण तब आया जब इतिहास के पहले शीतकालीन एशियाई खेलों में उन्हें खेलने का अवसर मिला और जापान के साप्पोरो में आयोजित हुई इस प्रतियोगिता में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया। अल्पाइन स्कीइंग के स्लैलम अथवा जायंट स्लैलम वर्गों में उन्होंने इस प्रतियोगिता में अन्य खिलाड़ियों के साथ भाग लिया और यह Shailaja के लिए बहुत बड़ा क्षण था।

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"मुझे स्कीइंग से प्यार था लेकिन मेरे परिवार के सहयोग ने खेल जीवन में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। मैंने एशियाई खेलों में भाग लिया और उसके बाद राष्ट्रिय प्रतियोगिताओं में भी चैंपियन रही। जब मुझे पता चला कि 1988 में भारत की ओर से महिलाऐं भी कैलगरी खेलों में भाग लेने जा सकती हैं और मुझे इस प्रतियोगिता में खेलने का अवसर मिलेगा, यह मेरे लिए बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी। मेरा और बाकी दो खिलाड़ियों का भाग लेना सिर्फ प्रतियोगिता के दृष्टिकोण से ही नहीं बल्कि भारत में शीतकालीन खेलों की प्रगति के लिए भी बहुत ज़रूरी था। अगर हम ओलंपिक खेलों में अच्छा प्रदर्शन नहीं दिखाते तो आलोचक और हमारे ऊपर प्रश्न उठाने वालों की बात सही साबित हो जाती। पहले तो शायद हमें समझ नहीं आया कि यह कितनी बड़ी बात है और जब आया मन में सिर्फ अच्छा प्रदर्शन दिखाने का भाव आया।"

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भारतीय खिलाड़ियों के लिए उत्पन्न होने वाली आर्थिक कठिनाइयों को आप किसी भी तरह नकार नहीं सकते लेकिन Shailaja और उनके साथ 1988 शीतकालीन खेलों में भाग लेने वाले बाकी दो खिलाड़ी (Gul Mustafa Dev और Kishor Rahtna Rai) के सहयोग ने उन्हें मानसिक शक्ति दी। ओलंपिक मंच पर जब Shailaja पहुंची तब उन्हें बिलकुल विश्वास नहीं हुआ कि वह वहां पहुंच चुकी हैं और उन्हें कनाडा में रहने वाले परिवारों के द्वारा सहयोग मिला। अन्य देशों की टीम के पास सहायता के लिए कई अधिकारी थे लेकिन Shailaja और उनके साथियों के पास कोई नहीं था।

"हमें अपनी स्की खुद साफ़ करनी पड़ती थी और बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन खेल से अपने प्रेम को हम सबसे ऊपर रखते थे। हमें न केवल अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला बल्कि अमेरिका अथवा अन्य सफल ओलंपिक देशों के खिलाड़ियों से बात करने का अवसर मिला। कुछ देशों के खिलाड़ी तो मुझे देख के हैरान थे और उन्हें विश्वास नहीं हुआ कि भारत की ओर से कोई महिला स्कीइंग जैसे खेल में ओलंपिक प्रतियोगिता में भाग ले रही है।"

Arif Khan.
फोटो क्रेडिट 2021 Getty Images

स्लैलम वर्ग में भाग लेने वाली Shailaja ने अपनी प्रतियोगिता में 28वां स्थान प्राप्त किया और दोनों दौड़ को 2:52.27 के समय में पूरा किया। अगर आप इसे यूरोप अथवा अमेरिका के खिलाड़ियों से तुलना करते हुए देखेंगे तो यह शायद उतनी बड़ी बात न हो लेकिन एक भारतीय महिला स्कीयर का ओलंपिक प्रतियोगिता के पहले भाग में आना बहुत बड़ी उपलब्धि थी।

अपने प्रदर्शन से Shailaja ने न केवल आने वाली पीढ़ियों को प्रोत्साहन का एक अवसर दिया बल्कि यह भी दिखाया कि आत्मविश्वास और दृढ निश्चय किसी भी स्थिति में आपको सफलता की ओर बढ़ा सकता है। ओलंपिक खेलों में भाग लेने के बाद भी आर्थिक परिस्थितियों ने Shailaja को एक नया व्यावसायिक जीवन चुनने पर विवश कर दिया लेकिन उन्होंने शीतकालीन खेलों से अपना संबंध बनाये रखा। 

उन्होंने विश्व ओलम्पियन एसोसिएशन के साथ काम किया और खिलाड़ियों कि सहायता की। अगले कुछ दशकों में उन्होंने भारतीय बायथलॉन संघ के साथ काम किया और आज भी वह जुड़ी हुई हैं।

बीजिंग 2022 शीतकालीन खेलों में भारत के लिए अपना स्थान पक्का करने वाले Arif Khan को करीब से जानने वाली Shailaja का मानना है कि कश्मीर के इस स्कीयर ने जो किया है वह अद्भुत है। Arif के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, "उनके सबसे बड़े गुण जूनून, दृढ़ निश्चय और सकारात्मक सोच हैं क्योंकि Arif ने बहुत मुश्किल समय देखा है जो किसी भी खिलाड़ी को हार मानने पर मजबूर कर सकता है। उन्हें बहुत बार सहयोग नहीं मिला और चीज़ें कभी उनके लिए सही नहीं थी लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी है।"

Shailaja का मानना है कि Arif की सफलता ओलंपिक प्रतियोगिता में उनके स्थान से नहीं बल्कि भारत के लिए जो उन्होंने किया है उससे परिभाषित होगी। वह मानती हैं कि पूरे देश को Arif का प्रदर्शन नहीं उनके जूनून अथवा जज़्बे को देखना चाहिए।

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