मीराबाई चानू की कहानी: रियो ओलंपिक से निराश लौटने के बाद टोक्यो 2020 में एक शानदार प्रदर्शन

भारतीय भारोत्तोलक ने रियो 2016 में निराशाजनक प्रदर्शन करने के बाद खेल को छोड़ने के बारे में सोचा था, लेकिन टोक्यो ओलंपिक ने मीराबाई चानू के करियर को एक नया मुकाम दिया।

लेखक रौशन प्रकाश वर्मा
फोटो क्रेडिट 2021 Getty Images

टोक्यो 2020 ओलंपिक में रजत पदक जीतने के बाद से मीराबाई चानू भारत की सबसे पसंदीदा खेल सितारों में से एक बन गईं हैं और उन्हें खेल प्रेमियों का भरपूर समर्थन मिला है।

8 अगस्त, 1994 को जन्मी, मणिपुर की भारोत्तोलक ने महिलाओं के 49 किग्रा भार वर्ग में पोडियम पर जगह बनाने के लिए 202 किग्रा (87 किग्रा स्नैच; 115 किग्रा क्लीन एंड जर्क) का संयुक्त भार उठाया।

हालांकि, ओलंपिक में रजत पदक जीतने वाली भारत की पहली भारोत्तोलक मीराबाई चानू के लिए यह सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। खासकर उन हालातों में जब वह रियो 2016 में अपने पहले ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों के दौरान क्लीन एंड जर्क में एक भी वैध लिफ्ट दर्ज करने में नाकामयाब रहीं थीं। 

मीराबाई चानू ने अपने निराशाजनक प्रदर्शन के बाद कहा था, "रियो 2016 ओलंपिक के बाद मैं वास्तव में अपना आत्मविश्वास खो चुकी थी।"

रियो 2016 से पहले, मीराबाई चानू ने कई प्रभावशाली प्रदर्शन किए थे जिसके कारण ग्रीष्मकालीन खेलों के लिए उन्हें भारत की ओर से पदक जीतने के प्रबल दावेदारों में से एक के रूप में देखा जाने लगा था। 

रियो ओलंपिक के लिए राष्ट्रीय चयन ट्रायल के दौरान मीराबाई चानू ने एथेंस 2004 ओलंपिक में भारोत्तोलक कुंजारानी देवी द्वारा बनाए गए 12 साल पुराने राष्ट्रीय रिकॉर्ड को तोड़ दिया था। उन्होंने यह कारनामा 85 किग्रा-स्नैच और 107 किलोग्राम-क्लीन एंड जर्क उठाकर किया था। चानू ने कुल 192 किग्रा का भार उठाया था।

आपको बता दें कि, उत्तर कोरिया की रयांग चुन ह्वा ने महिलाओं के 48 किग्रा में प्रतिस्पर्धा करते हुए लंदन 2012 ओलंपिक में 192 किग्रा भार उठाकर कांस्य पदक जीता था। इस लिहाज से चानू का यह प्रदर्शन काबिले-तारीफ था।

लेकिन, रियो में उनके सपनों के धराशायी होने के बाद, मीराबाई जब अपने देश लौटीं तब उनकी कड़ी आलोचना हुई, जिसने उन्हें बहुत हद तक कमजोर कर दिया। 

मीराबाई चानू ने कहा, “निराशा से उभरने में मुझे बहुत समय लगा। मैंने खेल छोड़ने और प्रशिक्षण बंद करने के बारे में भी सोचा। सोशल मीडिया पर टिप्पणियों और मेरे कोच के खिलाफ आलोचनाओं ने मुझे वास्तव में काफी आहत किया।”

टोक्यो में शानदार वापसी

हालांकि, मीराबाई चानू ने हिम्मत नहीं हारी और अपने दृढ़ संकल्प की बदौलत रियो 2016 में उन्होंने एक शानदार वापसी की जोरदार कहानी लिखी। 

2017 में एक शानदार प्रदर्शन करते हुए मीराबाई चानू ने रियो 2016 की निराशा को खत्म किया और आगे बढ़ीं। 2017 में उन्होंने विश्व

भारोत्तोलन चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। कर्णम मल्लेश्वरी (1994 और 1995) के बाद वह ऐसा करने वाली सिर्फ दूसरी भारतीय भारोत्तोलक बनीं।

इसके बाद USA में आयोजित विश्व चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने के लिए मीराबाई ने कुल 194 किग्रा (85 किग्रा स्नैच; 109 किग्रा क्लीन एंड जर्क) का भार उठाया। ऐसा कर उन्होंने खुद अपना ही राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ा। 

2018 में पीठ की समस्याओं से गुजरने और उस वर्ष एशियाई खेलों को छोड़ने के बावजूद, मीराबाई चानू सकारात्मक रही और 2018 में शानदार वापसी करते हुए उन्होंने राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता।

मणिपुरी भारोत्तोलक ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपने शानदार प्रदर्शन का दौर जारी रखा। 

2013 और 2017 राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप जीतने वाली मीराबाई चानू ने 2019 में तीसरी बार भी खिताब अपने नाम किया।

इसके बाद कोविड महामारी ने आने वाले दो वर्षों तक अधिकांश अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को बाधित कर दिया। लेकिन, मीराबाई चानू ने प्रशिक्षण जारी रखा और 2021 के ओलंपिक वर्ष में अपने करियर का शानदार प्रदर्शन किया। 

चानू ने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करने के लिए देर से आयोजित हुई एशियाई चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता। वहीं, कॉन्टिनेंटल मीट में उन्हें तीसरा स्थान हासिल हुआ। लेकिन चानू ने 49 किलोग्राम भार वर्ग में विश्व रिकॉर्ड बनाते हुए 119 किग्रा-क्लीन एंड जर्क लिफ्ट किया। इसी के साथ वह ओलंपिक में पदक जीतने के लिए एक महत्वपूर्ण दावेदार बन गईं।

टोक्यो ओलंपिक में मीराबाई चानू

मीराबाई चानू, रियो 2016 की तरह एक बार फिर टोक्यो 2020 ओलंपिक में भारत के लिए पदक जीतने के प्रबल दावेदारों में से एक थीं। इस बार उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े मंच पर बेहतरीन प्रदर्शन किया। 

कोविड के कारण उत्तर कोरिया के ओलंपिक से हटने के बाद मीराबाई चानू को टोक्यो खेलों में बढ़त मिली। उत्तर कोरियाई भारोत्तोलक री सोंग गम से कांस्य पदक मुकाबले में हारने के बाद मीराबाई चानू विश्व भारोत्तोलन चैंपियनशिप 2019 में पदक जीतने से चूक गई थीं।

टोक्यो 2020 से पहले, 49 किलोग्राम वर्ग में शीर्ष-दो रैंक वाले भारोत्तोलक चीन से ही थे। लेकिन ओलंपिक नियमों के मुताबिक किसी विशेष भार वर्ग में किसी देश से केवल एक भारोत्तोलक ही हिस्सा ले सकता है। इस वजह से चानू के पदक जीतने की संभावनाओं को और अधिक बल मिला। 

टोक्यो ओलंपिक में, मीराबाई चानू ने स्नैच में 84 किलोग्राम भार उठाकर शुरुआत की और इसे 87 किलोग्राम तक बढ़ाया। हालांकि, चीन की होउ झिहुई ने 94 किलोग्राम का भार उठाकर स्नैच में एक नया ओलंपिक रिकॉर्ड बना डाला और चानू को पीछे छोड़ दिया। मीराबाई चानू ने अपने अंतिम प्रयास में 89 किग्रा भार उठाने की कोशिश की लेकिन वे असफल रहीं।

क्लीन एंड जर्क राउंड में मीराबाई चानू ने 110 किग्रा भार उठाकर शुरुआत की और दूसरे प्रयास में 115 किग्रा तक सुधार किया। हालांकि, एक बार फिर से चीन की होउ झिहुई शीर्ष पर आ गईं। उन्होंने क्लीन एंड जर्क में 116 किग्रा का भार उठाकर अपने भार वर्ग में कुल 210 किग्रा लिफ्ट किया। 

चानू 117 किग्रा के अपने अंतिम प्रयास में विफल रहीं। लेकिन, अगर वह लिफ्ट करने में सफल हो भी जातीं तब भी वह पोडियम पर झिहुई के पीछे ही स्थान हासिल कर पातीं। 

इंडोनेशिया की आयशा विंडी कैंटिका ने 49 किग्रा वर्ग में 84 किग्रा-स्नैच और 110 किग्रा-क्लीन एंड जर्क के साथ कुल 194 किग्रा भार उठाकर कांस्य पदक जीता।

मीराबाई चानू ने टोक्यो ओलंपिक के बाद एक कार्यक्रम में पीटीआई से कहा, "मैंने रियो में पदार्पण किया था। मैं वहां जीत नहीं सकी। हालांकि, मैंने टोक्यो के लिए कड़ी मेहनत की थी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था और मैं घबरा गई थी। मैं टोक्यो में पदक सही योजना, प्रशिक्षण और तकनीक के कारण ही जीत सकी।"

2000 में सिडनी खेलों में कर्णम मल्लेश्वरी के कांस्य पदक के बाद यह ओलंपिक में भारत का दूसरा भारोत्तोलन पदक था और बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु के रियो 2016 में रजत के बाद ओलंपिक खेलों में किसी भारतीय महिला द्वारा सिर्फ दूसरा रजत पदक था।

ओलंपिक जाएं। यह सब पायें।

मुफ्त लाइव खेल आयोजन | सीरीज़ के लिए असीमित एक्सेस | ओलंपिक के बेमिसाल समाचार और हाइलाइट्स