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भारत में बॉक्सिंग का इतिहास: जानिए किस तरह हुई शुरुआत और कैसे बना भारत बॉक्सिंग में पावरहाउस

भारत 1920 के दशक से शौकिया मुक्केबाजी में शामिल रहा है और 1950 और 60 के दशक में एशिया में अपनी पहचान बनाई। अब हम विश्व स्तर पर नियमित पदक जीतने के दावेदार हैं।

7 मिनट द्वारा विवेक कुमार सिंह
लंदन 2012 की ब्रॉन्ज़ मेडल विजेता मैरी कॉम डेंगू से रिकवर कर रही हैं और वह ट्रेनिंग के लिए इटली नहीं जाएंगी।

ओलंपिक खेलों का मुक्केबाजी लंबे समय से हिस्सा रहा है, इसे दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक माना गया है।

3000 ईसा पूर्व मिस्र में अपनी जड़ें जमाने वाला मुक्केबाजी पहली बार 688 ईसा पूर्व में 23 वें ओलंपियाड में एक वैश्विक आयोजन के रूप में दिखाई दिया।

भारत के इतिहास में भी मुक्केबाज़ी का एक अलग रूप पाया गया है। महाकाव्य महाभारत सहित प्राचीन ग्रंथों में मुश्ती-युद्ध (मुट्ठी का युद्ध) नामक मुक्केबाजी की चर्चा हुई है।

हालांकि, आधुनिक ओलंपिक की बात की जाए तो शौकिया मुक्केबाजी ने संयुक्त राज्य अमेरिका के सेंट लुइस में आयोजित हुए 1904 ग्रीष्मकालीन ओलंपिक खेलों में अपनी शुरुआत की। वहीं, 1912 में ये ओलंपिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं था, लेकिन तब से, ये ग्रीष्मकालीन खेलों के हर संस्करण का हिस्सा रहा है।

शौकिया मुक्केबाजी के इतिहास का पता 1867 से लगाया जा सकता है, जब क्वींसबेरी नियम पहली बार प्रकाशित हुए थे।

जॉन ग्राहम चेम्बर्स नामक एक वेल्श खिलाड़ी ने क्वींसबेरी नियमों को लिखा था, ये नियम मुक्केबाजी के लिए एक आचार संहिता को औपचारिक रूप देने की मांग करती है। इससे पहले मुक्केबाज़ी में बिना किसी निश्चित नियमों के पुरस्कार दिए जाते थे।

बताते चलें कि पहली शौकिया मुक्केबाजी चैंपियनशिप उसी वर्ष आयोजित की गई थी जबकि पहली आधिकारिक चैंपियनशिप 1880 में आयोजित की गई।

दुनिया भर में इस खेल का तेजी से विकास हुआ और भारत में शौकिया मुक्केबाजी की उपस्थिति का पहला उदाहरण 1925 में देखा गया, जब बॉम्बे प्रेसीडेंसी एमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन का गठन किया गया था।

बॉम्बे शहर का नाम अब मुंबई हो गया है। तब का बॉम्बे भारत में औपचारिक रूप से मुक्केबाजी टूर्नामेंट आयोजित करने वाला पहला शहर था।

अगले कुछ दशकों में भारत में बॉक्सिंग का धीरे-धीरे विकास हुआ। ब्रिटिश शासन से भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद, 1949 में इंडियन एमेच्योर बॉक्सिंग फेडरेशन का गठन किया गया था।

भारत में पहली बार राष्ट्रीय मुक्केबाजी चैंपियनशिप 1950 में मुंबई के ब्रेबोर्न स्टेडियम में आयोजित हुई थी।

वैश्विक स्तर पर भारत शौकिया मुक्केबाजी में चार प्रमुख आयोजनों में भाग लेता है। ओलंपिक, विश्व चैंपियनशिप, एशियन गेम्स और राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाज़ प्रतिस्पर्धा करते हैं।

प्रत्येक इवेंट में भारतीय मुक्केबाजी के इतिहास पर एक नज़र

ओलंपिक में भारतीय मुक्केबाजी का इतिहास

ग्रीष्मकालीन खेलों में मुक्केबाजी लंबे समय से खेली जा रही है। भारत के पहले राष्ट्रीय मुक्केबाजी महासंघ के गठन से एक साल पहले ओलंपिक मुक्केबाजी में भारत ने पहली बार 1948 के लंदन ओलंपिक में हिस्सा लिया।

जहां सात भारतीय मुक्केबाज - रबिन भट्टा (Rabin Bhatta), बेनॉय बोस (Benoy Bose), रॉबर्ट क्रैन्स्टन (Robert Cranston), मैक जोआचिम (Mac Joachim), बाबू लाल (John Nutall), जॉन न्यूटल (Babu Lall), और जीन रेमंड (Gene Raymond) ने लंदन 1948 के लिए क्वालीफाई किया।

पुरुषों के बैंटमवेट (54 किग्रा) में बाबू लाल ने मुक्केबाजी में भारत के लिए पहली ओलंपिक जीत दर्ज की। इस दौरान उन्होंने राउंड ऑफ 32 में पाकिस्तान के एलन मोंटेइरो (Allan Monteiro) को हराया। हालांकि वो अगले दौर में प्यूर्टो रिकान के मुक्केबाज जुआन इवेंजेलिस्टा वेनेगस (Juan Evangelista Venegas) को मात देने में नाकाम रहे।

हालांकि 1948 ओलंपिक खेलों के बाद भारतीय मुक्केबाज अगले चार ओलंपिक (1956, 1960, 1964 और 1968) तक किसी के लिए क्वालीफाई नहीं कर सके ।

इस सूखे को मेहताब सिंह (Mehtab Singh), मुनिस्वामी वेणु (Muniswamy Venu) और चंद्र नारायणन (Chander Narayanan) ने खत्म किया, इन सभी ने 1972 म्यूनिख ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। तब से भारतीय मुक्केबाज प्रत्येक ओलंपिक खेलों का हिस्सा रहे हैं।

ओलंपिक पदक जीतने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज विजेंदर सिंह (Vijender Singh) थे - जिन्होंने 2008 बीजिंग ओलंपिक में पुरुषों के मिडिलवेट (75 किग्रा) वर्ग में कांस्य पदक जीता था

लंदन 2012 ओलंपिक कार्यक्रम में महिला मुक्केबाजी की शुरुआत की गई और भारतीय दिग्गज मुक्केबाज़ एमसी मैरी कॉम (MC Mary Kom) ने उस वर्ष भारत का दूसरा ओलंपिक मुक्केबाजी पदक जीता। जहां इस दौरान मैरी कॉम ने फ्लाईवेट (51 किग्रा) वर्ग में कांस्य पदक जीता था

विजेंदर सिंह ओलंपिक मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बॉक्सर बनें 
विजेंदर सिंह ओलंपिक मेडल जीतने वाले पहले भारतीय बॉक्सर बनें 

विश्व चैंपियनशिप में भारतीय मुक्केबाजी का इतिहास

अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी महासंघ (International Boxing Federation) के अंतर्गत पहली आधिकारिक विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप 1974 में आयोजित की गई थी। वहीं, पहली AIBA महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप 2001 में आयोजित की गई थी।

पहले हर चार साल में आयोजित होने वाली पुरुषों की विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप 1989 से प्रत्येक दूसरे साल आयोजित होने लगा, जबकि 2006 से महिलाओं का टूर्नामेंट भी प्रत्येक दो साल में आयोजित होने लगा।

भारतीय महिला दिग्गज मुक्केबाज़ मैरी कॉम की बदौलत भारतीय मुक्केबाजी ने महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में एक समृद्ध विरासत स्थापित किया है, जिन्होंने इस आयोजन में रिकॉर्ड छह स्वर्ण पदक जीते हैं।

मैरी कॉम महिला विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में सबसे सफल मुक्केबाज हैं। वो उद्घाटन संस्करण में लाइट फ्लाईवेट (48 किग्रा) वर्ग में रजत के साथ वैश्विक स्पर्धा में पदक जीतने वाली पहली भारतीय मुक्केबाज भी थीं।

मैरी कॉम के अलावा, भारत की लेखा केसी (Lekha KC), जेनी आरएल (Jenny RL) और लैशराम सरिता देवी ( Laishram Sarita Devi) भी अपनी-अपनी कैटेगरी में महिला विश्व चैंपियन रही हैं।

10 स्वर्ण, आठ रजत और 21 कांस्य पदक के साथ भारत रूस, चीन और टर्की के बाद महिला मुक्केबाजी चैंपियनशिप में चौथा सबसे सफल देश है।

विश्व चैंपियनशिप पदक जीतने वाले पहले पुरुष भारतीय मुक्केबाज विजेंदर सिंह थे, जिन्होंने 2009 विश्व चैंपियनशिप में मिडिलवेट डिवीजन में कांस्य पदक जीता था।

2019 संस्करण में अमित पंघल (Amit Pangal) ने फ्लाईवेट (52 किग्रा) में रजत पदक जीतकर विश्व चैंपियनशिप में भारत का सर्वेश्रेष्ट प्रदर्शन खुद के नाम दर्ज कराया। अभी तक किसी भी पुरुष भारतीय मुक्केबाज ने स्वर्ण पदक नहीं जीता है।

Mary Kom has won a record six world titles.
Mary Kom has won a record six world titles. (Getty Images)

एशियन गेम्स में भारतीय मुक्केबाजी का इतिहास

शौकिया मुक्केबाजी ने फिलीपींस के मनीला में 1954 के संस्करण में एशियन गेम्स में अपनी शुरुआत की। 2010 के एशियन गेम्स में महिलाओं की मुक्केबाजी की शुरुआत हुई। इससे पहले ये सिर्फ पुरुषों का इवेंट था।

पिछले कुछ वर्षों से एशियन गेम्स में भारतीय मुक्केबाजी को काफी सफलता मिली है। भारत नौ स्वर्ण, 16 रजत और 32 कांस्य पदक के साथ महाद्वीपीय प्रतियोगिता में आठवां सबसे सफल देश है।

एशियन गेम्स में पहले पदक जीतने वाले भारतीय मुक्केबाज़ सुंदर राव (Sundar Rao) और हरि सिंह (Hari Singh) थे, सुंदर राव ने लाइटवेट (60 किग्रा) वर्ग में कांस्य पदक जीता था और पुरुषों के मिडिलवेट (75 किग्रा) वर्ग में हरि सिंह ने रजत पदक जीता था। जहां दोनों पदक 1958 के एशियाई खेलों में आए थे।

चार साल बाद भारतीय मुक्केबाजी को अपना पहला एशियन चैंपियन मिला। जहां पदम बहादुर मॉल (Padam Bahadur Mall) ने फाइनल में जापान के कनेमारू शिराटोरी को हराकर पुरुषों के लाइटवेट वर्ग में स्वर्ण पदक जीता।

हवा सिंह (Hawa Singh) दो एशियन गेम्स में स्वर्ण जीतने वाले एकमात्र भारतीय मुक्केबाज हैं। उन्होंने 1966 के एशियन गेम्स में हैवीवेट (81+ किग्रा) डिवीजन में अपना पहला स्वर्ण जीता और 1970 के एशियन गेम्स में अपने खिताब का बचाव किया।

महिला वर्ग में मैरी कॉम भारतीय मुक्केबाजी की पहली एशियन गेम्स की पदक विजेता बनीं, जिन्होंने 2010 एशियन गेम्स में फ्लाईवेट (51 किग्रा) में कांस्य पदक जीता।

वो एशियन गेम्स का स्वर्ण जीतने वाली एकमात्र महिला भारतीय मुक्केबाज भी हैं, उन्होंने ये कारनामा 2014 के संस्करण में किया था।

राष्ट्रमंडल खेलों में भारतीय मुक्केबाजी का इतिहास

1930 में पहली बार राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन हुआ। उस संस्करण में मुक्केबाजी को शामिल किया गया था, जब इसे ब्रिटिश एंपायर गेम्स (British Empire Games) के नाम से जाना जाता था। महिला मुक्केबाजी को पहली बार 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में शामिल किया गया था।

राष्ट्रमंडल खेलों में भी भारतीय मुक्केबाजी का इतिहास पुराना है। भारतीय मुक्केबाज़ों ने आठ स्वर्ण, 12 रजत और 17 कांस्य पदक हासिल कर राष्ट्रमंडल देशों में मुक्केबाजी में पदक जीतने के मामले में भारत 10वें स्थान पर है।

राष्ट्रमंडल खेलों में पदक जीतने वाले पहले भारतीय मुक्केबाज शिवाजी भोंसले (Shivaji Bhonsle) थे, जिन्होंने 1970 राष्ट्रमंडल खेलों में पुरुषों के वेल्टरवेट (69 किग्रा) में कांस्य पदक जीता था।

भारतीय मुक्केबाजी का पहला राष्ट्रमंडल खेलों का स्वर्ण पदक 2002 के संस्करण में आया था, जहां मोहम्मद अली क़मर (Mohammad Ali Qamar) ने लाइट फ्लाईवेट (49 किग्रा) डिवीजन में स्वर्ण पदक जीता था।

पिंकी रानी (Pinki Rani) 2014 राष्ट्रमंडल खेलों में फ्लाईवेट वर्ग में कांस्य पदक जीतने वाली पहली महिला भारतीय मुक्केबाज बनीं।

वहीं मैरी कॉम 2018 संस्करण में फ्लाईवेट वर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला मुक्केबाज़ बनीं।

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