क्या बजरंग पूनिया टोक्यो में अपने गुरु योगेश्वर दत्त से ज्यादा चमक सकते हैं?

पूनिया ने कई मौकों पर यह स्पष्ट किया है कि वह अपने गुरु योगेश्वर दत्त को आदर्श मानते हैं और उनके जैसा बनना चाहते हैं।

लेखक दिनेश चंद शर्मा

2018 एशियाई खेलों में बजरंग पूनिया (Bajrang Punia) ने राउंड ऑफ 16 में सिरोजिद्दीन खासानोव (Sirojiddin Khasanov) को बाहर कर दिया। भले ही उज़्बेकिस्तान का पहलवान पहले दौर में 3-0 की बढ़त लेने के लिए आगे बढ़े। हालांकि, पूनिया के लगातार 13 अंकों ने न केवल खासानोव को रौंदा, बल्कि अन्य पहलवानों के लिए एक स्पष्ट चुनौती के रूप में भी काम किया। क्वार्टर और सेमीफाइनल में भी वो अपराजित रहे। उन्होंने ताजिकिस्तान के अब्दुल कोसिम (Abdulqosim) को 12-2 से हराया और मंगोलिया के बाटमग्लाई बाचुलुम (Batmaglai Batchuluum)को 10-0 से हराकर फाइनल में जगह बनाई।

फाइनल से पहले वह अपने जीवन में एक महत्वपूर्ण चौराहे पर खड़े थे।

चार साल पहले उनके मार्गदर्शक, प्रेरणास्रोत और दोस्त ने समान भार वर्ग में इसी प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता था। पूनिया भी टूर्नामेंट का हिस्सा थे। इसलिए, वो 61 किग्रा भारवर्ग में मुकाबला कर रहे थे, ताकि उन्हें किसी भी स्तर पर दत्त का सामना न करना पड़े।

उन्होंने जकार्ता में 2018 एशियाई खेलों के लिए रवाना होने से पहले कहा था, "योगेश्वर मेरे आदर्श हैं।"  

*ऐसे शुरू हुआ पहलवानी में सफर  *

पूनिया ने सात साल की उम्र में अपने पिता और बड़े भाई से प्रेरित होकर एक पहलवान के रूप में अपनी यात्रा शुरू की। जल्द ही हरियाणा में अपने गांव के मिट्‌टी के अखाड़ों से वह एक पेशेवर कोच महाबलेश्वर पाल (Mahabaleshwar Pal) के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेने के लिए नई दिल्ली के छत्रसाल स्टेडियम में पहुंच गए। वहां 2008 में उनकी मुलाकात योगेश्वर दत्त (Yogeshwar Dutt) से हुई, जो पहले से ही भारत के कुश्ती परिदृश्य में एक स्टार थे

युवा पूनिया ने दत्त के नक्शेकदम पर चलना शुरू कर दिया और व्यवहार में मेहनती स्वभाव के कारण दत्त भी युवा को पसंद करने लगे। इसलिए, वरिष्ठ पहलवान ने उन्हें अपनी छत्रछांया में ले लिया। 2014 में पूनिया, योगेश्वर की अकादमी में शामिल हो गए और उनका जुड़ाव और मजबूत हो गया।

उनका रिश्ता निस्वार्थ था और इसमें अहंकार और प्रतिस्पर्धा को जगह नहीं थी। 2016 के रियो ओलंपिक में पूनिया ने खुशी-खुशी 65 किग्रा का स्थान अपने गुरु दत्त के लिए छोड़ दिया। लेकिन यह निर्णय दत्त के लिए अभिशाप बन गया। क्योंकि, वह मंगोलियाई गंज़ोरिगीना मंदाखनारन (Ganzorigiina Mandakhnaran) से हारने के बाद पहले दौर में बाहर हो गये। जल्द ही उन्होंने संन्यास ले लिया और इसके बाद ही, पूनिया ने 65 किग्रा भार वर्ग में कुश्ती शुरू की।

लेकिन, अपनी नए भार वर्ग में उन्हें पारंगत होने में वक्त लगा। 2017 विश्व चैंपियनशिप उनके लिए कठिन समय था और वो 13वें स्थान पर रहे। हालांकि, उन्होंने अप्रैल 2018 राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था, लेकिन कुछ महीने बाद एशियाई खेलों में उनका चुनौतीपूर्ण टेस्ट था।

2018 एशियाई खेलों का फाइनल

पहले दौर में अपने विरोधियों को पछाड़ने के बाद पूनिया को जापान के दाइची तकातानी (Daichi Takatani) के खिलाफ उतारा गया था। यह एक मुश्किल मैच था, क्योंकि जापानी पहले भी उन्हें करा चुके थे। इसलिए उनकी चाल से अच्छी तरह वाकिफ थे। हालांकि, पूनिया जिन्हें धीमी शुरुआत के लिए जाना जाता है, उन्होंने 60 सेकेंड से भी कम समय में 6-0 की बढ़त हासिल कर ली। लेकिन, उसने अंदर कुछ फंस गया। संतोष या घबराहट, कोई नहीं बता सकता। तकातानी ने उनके कमजोर डिफेंस का भरपूर फायदा उठाया और कुछ ही समय में अंतर को खत्म कर दिया।

इस मोड़ पर पूनिया को अपने गुरु की कुछ तरकीबें अजमानी पड़ीं। दत्त की तरह अपनी पारंपरिक शैली से हटकर उन्होंने तकनीक और तीखेपन पर ध्यान केंद्रित किया। रणनीति में बदलाव से उनकी झोली में चार अंक आ गिरे, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी ने दो अंक हासिल किए। अंतिम दौर में प्रतिद्वंद्वी पर हावी होते हुए 10-8 के स्कोर से मैच जीत लिया। इस स्वर्ण पदक ने आखिरकार पूनिया को दत्त की छांया से बाहर निकलने में मदद की। लेकिन, जीत के बाद भी वो विनम्र थे।

उन्होंने जीतने के बाद कहा, "मैं योगेश्वर के नेतृत्व में एक पहलवान के रूप में विकसित हुआ हूं और आज जो कुछ भी हूं और जो कुछ भी मैंने हासिल किया है, वह उनकी वजह से है। उन्होंने संन्यास लेने का फैसला किया, ताकि मैं उनकी श्रेणी में कुश्ती लड़ सकूं। लेकिन, अगर भविष्य में वो कभी वापसी करने का फैसला करते हैं, तो मैं इस भार वर्ग से हट जाऊंगा। मैं उनके सामने कुश्ती नहीं करूंगा। आप इसे भाई के लिए प्यार या गुरू के लिए सम्मान कह सकते हैं।"

वहीं, इस जीत से दत्त का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

उन्होंने कहा, "मुझे इससे बड़ी खुशी नहीं मिल सकती। उसने मुझे और पूरे देश को गौरवान्वित किया है। एशियाई खेलों में प्रतियोगिता हमेशा कठिन होती है, लेकिन बजरंग ने खुद पर भरोसो किया और जीत हासिल की।"

"फाइनल में प्रतिद्वंद्वी (जापान के ताकातानी दाइची) ने उन्हें पूर्व में हराया था, लेकिन उसने इससे खुद को प्रभावित नहीं होने दिया। यह बहुत तेज और अच्छा मुकाबला था। बजरंग ने छह अंक लेकर अच्छी शुरुआत की।"

अंतिम लक्ष्य

योगेश्वर दत्त ने 2012 लंदन ओलंपिक में कांस्य पदक जीता और विश्व चैम्पियनशिप को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं से पदक हासिल किया। उनके शिष्य ने उनकी इच्छा को पूरा करते हुए 2018 में बुडापेस्ट में रजत पदक जीता। शानदार फॉर्म के चलते उसी साल पूनिया दुनिया में पहले नंबर पर पहुंच गए।

एक दशक बाद उनका कद अपने गुरु से कम नहीं था। लेकिन, अभी मीलों चलना बाकी था।

पूनिया ने याद करते हुए कहा, "अगर हम विश्व चैंपियन को हराते हैं, तभी दुनिया हमें मानेगी और हम नाम कमा पायेंगे। इसलिए, वो (योगेश्वर) कहते हैं कि बड़े लोगों को हराकर खुद को बड़ा बनाओ। वह हमेशा मनोबल और प्रेरणा बढ़ाते रहते हैं।" .

विश्व चैंपियन को हराने के लिए ओलंपिक से बेहतर कोई मंच नहीं है। एक ऐसा आयोजन जिसमें उन्होंने अभी तक भाग नहीं लिया है।

संन्यास लेने के बाद दत्त टोक्यो 2020 के लिए पूनिया की मदद करने में व्यस्त थे। हालांकि, जब से कोरोना वायरस महामारी के कारण यह कार्यक्रम स्थगित हुआ, तब से यह जोड़ी नियमित रूप से नहीं मिली है।

कुछ महीने पहले पूनिया ने कहा था, "वह (योगेश्वर) अब राजनीति में व्यस्त हैं और मैं बेंगलुरु और रूस में ओलंपिक के लिए प्रशिक्षण ले रहा हूं।"

लेकिन, यह कोई भी इस बात को निश्चित तौर पर कह सकता है कि जब उनका पसंदीदा शिष्य टोक्यो में मैट पर कुश्ती लड़ रहा होगा, तब दत्त टीवी स्क्रीन से चिपके रहेंगे।

क्या पूनिया टोक्यो में स्वर्ण पदक जीत सकते हैं? अगर, वो ऐसा कर पाते हैं, तो यह उस व्यक्ति को सच्चा सम्मान देना होगा, जिन्होंने पूनिया को उस खेल में शामिल किया, जो उसके जीवन को परिभाषित करता है।