बजरंग पूनिया ने ओलंपिक में की गुरु योगेश्वर दत्त के रिकॉर्ड की बराबरी

पूनिया ने टोक्यो 2020 में पुरुषों की 65 किग्रा फ्रीस्टाइल कुश्ती स्पर्धा में जीता कांस्य पदक।

लेखक भारत शर्मा
फोटो क्रेडिट Getty Images

लंदन 2012 के कांस्य पदक विजेता योगेश्वर दत्त ने 2018 में जब कुश्ती छोड़ी थी तो उनका एक ही लक्ष्य था कि वह प्रशिक्षु बजरंग पुनिया को ओलंपिक में अपने रिकॉर्ड की बराबरी करते हुए देखे।

वह सपना शनिवार को टोक्यो 2020 में उस समय पूरा हो गया, जब पूनिया ने अपने कजाकिस्तान के प्रतिद्वंद्वी दौलेट नियाज़बेकोव को 8-0 से धराशाही करते हुए पुरुषों की 65 किग्रा फ्रीस्टाइल श्रेणी का कांस्य पदक अपने नाम कर लिया।

हालांकि, योगेश्वर दत्त का ओलंपिक में पोडियम फिनिश का सपना 2005 से पहले का है। इसकी शुरुआत तब हुई जब पुनिया को वीरेंद्र कुमार के अखाड़े (कुश्ती का स्थल) से मैट पर प्रशिक्षण के लिए बुलाया गया था। वहां योगेश्वर दत्त और सुशील कुमार जैसे चैंपियन पहलवानों ने उन्हें शुरुआती गुर सिखाए थे।

पुनिया पहले दत्त के प्रशिक्षण को बड़ी उत्सुकता से देखते थे, लेकिन उन्होंने अपने पिता को खोने और घुटने की चोट के बावजूद 2006 के एशियाई खेलों में 60 किग्रा फ्रीस्टाइल वर्ग में कांस्य पदक जीतने के बाद उन्होंने 38 वर्षीय दत्त को मन ही मन अपना गुरू बना लिया।

हालांकि, पूनिया को दत्त से पहली बार प्रशिक्षण लेने का मौका साल 2008 में छत्रसाल स्टेडियम पहुंचने के बाद मिला था।

पूनिया ने Olympics.com से कहा, "2012 में जब मैंने राष्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक जीता था, तब मैंने योगी भाई के साथ प्रशिक्षण शुरू किया था। उस दौरान जब मेरा फॉर्म खराब होता तो वह मेरा मार्गदर्शन करते थे और उसमें सुधार कराते थे। उनका समर्थन आज भी मेरे साथ है।"

भारत के राष्ट्रीय ध्वज के साथ पहलवान बजरंग पूनिया।

वास्तव में, रियो 2016 में बजरंग ने योगेश्वर के लिए 65 किग्रा वर्ग में अपना स्थान छोड़ने का फैसला किया, ताकि उनके गुरु उनके प्रमुख नहीं होने के बावजूद एक स्वर्ण पदक जीत सके। हालांकि, रियो 2016 के बाद बजरंग ने फिर से उस भार वर्ग को अपना लिया।

फिर 2018 में दत्त ने पुनिया पर पूरा ध्यान देने के लिए कुश्ती छोड़ने का फैसला किया। दत्त ने कहा, "मैं चाहता हूं कि भारत के लोग योगेश्वर को बजरंग में देखें। मेरा करियर लंबा था और मैं नहीं चाहता कि बजरंग प्रभावित हो।"

उन्होंने कहा, "(बजरंग) हमेशा बहुत मेहनती बच्चा रहा है और मैं चाहता हूं कि वह मुझसे बेहतर करे।"

आज, यह कहा जा सकता है कि पूनिया अपने गुरु की उम्मीदों पर खरे उतरे और अपनी इच्छाओं को भी पूरा किया। अब उनकी ट्रॉफियों की रैक में राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाई खेलों के पदक के अलावा एक ओलंपिक पदक से भी सजी होगी।

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