जानिए कैसे पुलेला गोपीचंद ने दर्द को मात देकर जीता था ऑल इंग्लैंड ओपन का खिताब

2001 में पुलेला गोपीचंद की ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीत, आधुनिक भारतीय बैडमिंटन के लिए सबसे यादगार इवेंट है।

लेखक विवेक कुमार सिंह

2001 में ऑल इंग्लैंड ओपन चैंपियनशिप में पुलेला गोपीचंद की खिताबी जीत हमेशा के लिए भारतीय बैडमिंटन इतिहास का एक अभिन्न अध्याय बन गया।

अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन कैलेंडर में सबसे प्रतिष्ठित वार्षिक इवेंट में से एक ऑल इंग्लैंड ओपन का भारतीय बैडमिंटन से विशेष संबंध रहा है।

1980 के संस्करण में प्रकाश पादुकोण ने विश्व बैडमिंटन मंच पर देश की पहली उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। हालांकि, गोपीचंद की जीत व्यक्तिगत कारणों से अपना अलग महत्व रखती है।

खुद को साबित करने का मौक़ा

जब पुलेला गोपीचंद एक युवा खिलाड़ी थे, तब उनकी प्रतिभा देखने लायक थी। उनकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती थी। उन्हें खेलते देख कर ऐसा लगता था कि हैदराबादी शटलर एक दिन दुनिया के सबसे बेहतरीन खिलाड़ियों में से एक बनेंगे।

हालांकि, भाग्य ने 1994 में एक अलग मोड़ लिया। पुलेला गोपीचंद 20 साल की उम्र में अंतरराष्ट्रीय मंच पर कदम रख चुके थे। तभी उन्हें पुणे में घुटने में चोट लग गई।

90 के दशक में उन्हें लगी घुटने की चोट ने उनके करियर को क़रीब क़रीब खत्म कर दिया था।

लेकिन अगले दो वर्षों में तीन बड़ी सर्जरी से गुजरने और कड़ी मेहनत के बाद, गोपीचंद ने वापसी की और एक सफल करियर बनाया।

पुलेला गोपीचंद ने 1996 का नेशनल जीता और अगले पांच सालों तक इस खिताब को वो जीतते रहे।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर उन्होंने 1998 के राष्ट्रमंडल खेलों और 2000 एशियन चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीता।

पुलेला गोपीचंद ने अंतरराष्ट्रीय बैडमिंटन महासंघ के कुछ लोवर-टियर के अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट भी जीत हासिल की। आज के बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन का कार्य पहले IBF करता था।

हालांकि, उनके घुटने की चोट ने उनकी क्षमता को कम करना शुरू कर दिया था, ये साफ तौर पर जाहिर होने लगा था। चोट ने उन्हें कई बार परेशान किया और विशेष रूप से बड़े इवेंट्स से पहले वो ज्यादा परेशान दिखे।

साल 2000 तक पुलेला गोपीचंद ने तीन बार बड़े इवेंट्स में उपविजेता रहे। 1997 इंडिया ओपन, 1999 फ्रेंच और जर्मन ओपन जैसे उच्च स्तरीय आईबीएफ विश्व ग्रां प्री स्पर्धाओं में भाग लिया और उपविजेता रहे। लेकिन तीनों बार वो खिताब जीतने में असफल रहे।

ऑल इंग्लैंड को IBF वर्ल्ड ग्रां प्री टूर्नामेंट के रूप में भी जाना जाता था।

पुलेला गोपीचंद के घुटने की चोट ने एक बार फिर से उन्हें निराश किया जब वो 2000 सिडनी ओलंपिक में खेलने गए थे।

घुटने में सूजन और बुखार के साथ खेलने के लिए मजबूर गोपीचंद अपने पहले ग्रीष्मकालीन खेल में प्री-क्वार्टर फाइनल से बाहर हो गए।

इस घटना ने गोपी को पूरी तरह से हिला दिया। छह महीने बाद बर्मिंघम में वो ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप में उतरे, तो भारतीय शटलर को खुद से बहुत उम्मीद नहीं थी।

उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा, "मैंने खुद से सिडनी में बहुत उम्मीद की थी और पूरी तरह से निराश हुआ था इसलिए मैंने ऑल इंग्लैंड में बिना किसी उम्मीद के साथ जाने का फैसला किया। निराशा से बचने के लिए ये जानबूझकर खुद से किया गया एक समझौता था। मैंने बहुत अच्छी तरह से तैयारी की, लेकिन कोई उम्मीद नहीं की।”

दुनिया को भी भारतीय खिलाड़ी से बहुत उम्मीद नहीं थी। पुलेला गोपीचंद को टूर्नामेंट में 10वीं वरीयता दी गई। उनके घुटने की चोट को भी अच्छी तरह से उजागर किया गया था और किसी ने भी 27 वर्षीय को जीत की उम्मीदवार नहीं माना था।

ये वो समय था जब गोपीचंद को सभी के साथ खुद को गलत साबित करना था।

बर्मिंघम में पुलेला गोपीचंद का ऑल इंग्लैंड मुक़ाबला

2001 के ऑल इंग्लैंड ओपन को सेक्शन 1 में ड्रा किया गया और ये ड्रा गोपीचंद के लिए अच्छा नहीं था।

शुरुआती दौर में 15-12, 15-12 स्कोरर के साथ सिंगापुरी शटलर रोनाल्ड सुसिलो को हराने के बाद गोपीचंद को अपने दूसरे दौर में इंग्लिश नेशनल चैंपियन कॉलिन ह्यूटन से भिड़ना था।

शुरुआती मैच में शानदार जीत दर्ज करने के बाद भारतीय खिलाड़ी के हौसले और बुलंद हो गए। उन्होंने अपने राउंड ऑफ 32 के मैच में ब्रिटेन के कॉलिन ह्यूटन को 15-7, 15-4 से हराया। इसके बाद गोपीचंद को सबसे कड़ी चुनौती मिलने वाली थी। राउंड ऑफ 16 के मैच में उनका सामना चीनी खिलाड़ी जी शिनपेंग से होना था, जो उस समय के ओलंपिक चैंपियन थे।

गोपी ने अपने करियर में पहली बार ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल में प्रवेश किया था। उन्होंने शिनपेंग को एकतरफा मुकाबले में 15-3, 15-9 से हरा दिया। इस मैच में गोपी ने शानदार प्रदर्शन किया और चीनी खिलाड़ी को चारों खाने चित कर दिया।

सबको लगा रहा थी कि गोपी अंतिम आठ में इंडोनेशियाई दिग्गज तौफिक हिदायत के खिलाफ मुक़ाबला करेंगे लेकिन भारतीय खिलाड़ी के सामने डेनमार्क के युवा खिलाड़ी एंडर्स बोयसेन कोर्ट में उतरे। जिन्होंने तौफिक के खिलाफ एक बड़ी जीत हासिल की थी। क्वार्टरफाइनल में पहुंचने के लिए बोयसेन ने तौफिक के खिलाफ बड़ा उलटफेर किया और उन्हें टूर्नामेंट से बाहर कर दिया।

हालांकि पुलेला गोपीचंद ने डेनमार्क के युवा खिलाड़ी बोयसेन को 15-11, 15-7 से हराकर सेमीफाइनल में प्रवेश कर लिया।

इस जीत ने गोपीचंद को एक और डेनिश खिलाड़ी के सामने खड़ा कर दिया। लेकिन यह कोई अनजान युवा खिलाड़ी नहीं था। विश्व नंबर 1 पीटर गाडे ऑल इंग्लैंड के पूर्व विजेता और पांच बार के यूरोपीय चैंपियन गोपीचंद को फाइनल में जाने से नहीं रोक सके।

इससे पहले गोपीचंद ने दो बार (1997 डेनिश ओपन और 1998 स्विस ओपन) में गाडे का सामना किया था और उन्हें कभी नहीं हराया था।

हालांकि मैच के दिन कहानी बदल गई। पुलेला गोपीचंद ने डेनमार्क के दिग्गज खिलाड़ी को 17-14, 17-15 से हराकर फाइनल में प्रवेश किया। दोनों गेम टाई-ब्रेक में खेला गया और जीत गोपीचंद के नाम दर्ज हुई।

आज तक भारतीय ने गाडे को कभी नहीं हराया था और जब हराया तब वो दर्द और घुटने की समस्या से जूझ रहे थे। ये गाडे के खिलाफ गोपीचंद की एकमात्र जीत थी।

कंक्रीट पर खेलने वाले खिलाडियों के घुटनों पर जोर पड़ता था। गोपीचंद अगले मैच के लिए खुद को तैयार रखने के लिए अभ्यास सत्र के बाद बर्फ से स्नान करते थे।

पुलेला गोपीचंद ने कहा, "मैं उस ऑल इंग्लैंड टूर्नामेंट से दर्द से गुजरा था। लेकिन मैं पूरी तरह से फोकस था।''

संयोग से ये आखिरी ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप थी, जो कंक्रीट पर खेला गया था। इसके बाद अगले साल से सिंथेटिक मैट पर ये टूर्नामेंट खेला जाने लगा।

फाइनल में पुलेला गोपीचंद चीनी शटलर चेन होंग के खिलाफ कोर्ट पर उतरे।

हालांकि इस टूर्नामेंट से शिनपेंग या गाडे जैसा कोई बड़ा नाम नहीं रहा था। सिडनी 2000 के रजत पदक विजेता हेंड्रावन को हराने वाले हाँग ने टूर्नामेंट के फाइनल में जगह बनाई।

फाइनल में पुलेला गोपीचंद की खराब शुरुआत रही और वो 11-7 से पिछड़ गए। लेकिन जल्द ही उन्होंने वापसी की और कई आक्रामक शॉट खेले।

गोपीचंद ने ये मुक़ाबला 15-12, 15–6 से जीत लिया। जिसे आज भी भारतीय बैडमिंटन के ऐतिहासिक जीतों में से एक माना जाता है।

पुलेला गोपीचंद की शुरुआती करियर में 1980 के चैंपियन प्रकाश पादुकोण ने मेंटॉर की भुमिका निभाई थी, उन्होंने कहा, "ये एक शानदार उपलब्धि थी ... भारतीय बैडमिंटन के लिए एक शानदार दिन था। इस दिन को भारतीय बैडमिंटन के सुनहरे अक्षरों में लिखा गया। गोपीचंद ने साबित किया है कि भारतीय विश्व विजेता हो सकते हैं।”

खुद गोपीचंद के लिए, ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीत न सिर्फ उनके वर्षों के संघर्षपूर्ण संघर्ष का परिणाम था, बल्कि वो आधार भी था, जिसके आधार पर वो कोच के रूप में भारतीय बैडमिंटन के भविष्य का निर्माण करने में सफल हो पाए।

“1980 में जब प्रकाश सर ने ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप जीता और साल 2000 में मैंने, तो उसके बीच में बैडमिंटन देश में से लगभग गायब हो गया था।”

“मेरे लिए ये साबित करना महत्वपूर्ण था कि भारतीय खिलाड़ी आधुनिक युग के बैडमिंटन में जीत सकते हैं जहाँ शक्ति और फिटनेस बहुत महत्व था। गोपीचंद ने इंडिया टुडे को बताया कि उस जीत के बिना, मैं कोचिंग प्लेटफॉर्म नहीं बना पाता और हम ये कुछ भी हासिल नहीं कर पाते।

गोपीचंद की छात्रों की सूची में लंदन 2012 की कांस्य पदक विजेता साइना नेहवाल, रियो 2016 की रजत पदक विजेता और मौजूदा महिला विश्व विजेता पीवी सिंधु, पूर्व विश्व नंबर 1 पुरुष खिलाड़ी किदांबी श्रीकांत और कई अन्य शीर्ष शटलर शामिल हैं, जिन्होंने सामूहिक रूप से भारतीय बैडमिंटन को दुनिया के पटल पर नई पहचान दिलाई है।

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