भारतीय फुटबॉल टीम के प्रसिद्ध खिलाड़ियों पर डालें एक नज़र

1948 से 1964 तक भारतीय फुटबॉल अपने चरम पर था, क्योंकि भारत ने चार ओलंपिक खेलों और दो एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किया था।

लेखक सतीश त्रिपाठी

1950 और 60 के दशक को मुख्य रूप से भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम युग माना जाता है, जबकि 1948 के ओलंपिक में फ्रांस के खिलाफ भारतीय टीम नंगे पैर उतरी थी, क्योंकि उन दिनों भारतीय टीम नंगे पैर फुटबॉल खेलती थी। इस मैच के दौरान भारतीय टीम ने अपनी प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाफ जबर्दस्त प्रदर्शन किया और भारतीय फुटबॉल टीम ने इतिहास के अपने 16 वर्षों के इस शानदार खेल से सभी को चौंका दिया।

यह ब्लू टाइगर्स का दशक था, जिसने दो एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक हासिल किए और 1956 के ओलंपिक खेलों में चौथे स्थान पर रहे, अपने पहले एशियाई कप में हिस्सा लिया और इसके साथ कई और भी खिताब अपने नाम किए। आइए यहां भारतीय फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों की एक झलक देखते हैं, जिन्होंने उस समय की बेहतरीन पीढ़ी का नेतृत्व किया।

पीके बनर्जी - गोल करने के मास्टर

पीके बनर्जी ने तुलसीदास बालाराम और चूनी गोस्वामी के साथ मिलकर भारतीय फुटबॉल के स्वर्ण युग के समय त्रिमूर्ति का गठन किया।

1955 में अपने अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल के डेब्यू के बाद भारत को एक बेहतरीन हमलावर टीम बनाने में अपना अहम योगदान दिया। पीके बनर्जी 1956 के खेलों में भारत के सेमीफाइनल मुकाबले में हिस्सा लिए और इसके साथ ही रोम में 1960 के ओलंपिक खेल में भारत की कप्तानी की ज़िम्मेदारी संभाली।

रोम में पीके ने एक यादगार गोल दागा, जिसने भारत को फ्रांस के खिलाफ 1-1 से ड्रॉ की तरफ मोड़ दिया, जिसे भारत के सबसे बड़े परिणामों में से एक माना जाता है।

पीके बनर्जी ने तीन एशियाई खेलों में हिस्सा लिया। इसके साथ ही उन्होंने 1962 में भारतीय फुटबॉल टीम के स्वर्णिम सफर में अपनी अहम भूमिका निभाई। इस दौरान वह टीम के एक शीर्ष स्कोरर के रूप में भी रहे।

पीके बनर्जी मुख्य रूप से एक राइट विंगर के रूप में खेलते थे। वह मैदान पर किसी भी स्थिति में विपक्षी टीम पर हमला करने और गोल करने की क्षमता रखते थे।

प्रमुख भारतीय फुटबॉल इतिहास कार गौतम रॉय ने ओलंपिक चैनल से बात करते हुए कहा "उनके पास खेलने की विस्फोटक क्षमता थी। उनकी मुख्य विशेषता यह थी कि वह एक एंगल से आसानी से बॉक्स के अंदर या बाहर से स्कोर कर सकते थे।”

"उनके पास एक अच्छा हेडर और एक बेहतरीन पासर भी था, जो अपने साथियों को सटीक क्रॉस के साथ विंग से आसानी से हिट करते थे।"

पीके के पास खेलने का अनोखा तरीका था। जिसने उन्हें मैदान पर डटे रहने में काफी मदद की और इसके साथ वह एक सफल कोच के बाद उन्होंने अपनी करियर को अलविदा कहा। वहीं, इस साल के शुरुआत में उनका निधन हो गया। बनर्जी अपने प्रबंधकीय करियर के दौरान भाईचुंग भूटिया के मेंटर थे।

यही नहीं भारतीय फुटबॉल में पीके बनर्जी के योगदान को फीफा ने भी सराहा था। इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ फुटबॉल हिस्ट्री एंड स्टैटिस्टिक्स (IFFHS) ने 20वीं शताब्दी के एक बेहतरीन खिलाड़ी के तौर पर उन्हें ऑर्डर ऑफ मेरिट से सम्मानित किया था। जो यह किसी खिलाड़ी के लिए बहुत बड़ी बात होती है।

चूनी गोस्वामी- एक पोस्टर ब्वॉय

सबिमल गोस्वामी चूनी के नाम से मशहूर थे, जो बनर्जी के एक साल बाद अंतरराष्ट्रीय टीम में आए और मैदान अपना जलबा बिखेरा। वह 1962 के एशियाई खेलों के दौरान भारत के कप्तान थे और एशिया की दिग्गज टीम दक्षिण कोरिया को हराकर टीम को स्वर्ण पदक दिलाया। वह 1964 के एशियाई खेलों में ब्लू टाइगर्स के कप्तान भी थे, जहां भारत उपविजेता रहा।

चुनी गोस्वामी की मैदान पर उपस्थिति, अटैकिंग स्किल या फिर कौशल ने नहीं बल्कि उनकी मैदान पर खेलने की बेहतरीन क्षमता ने उनको एक बेहतरीन खिलाड़ी बनाया, जिससे उनके साथियों को इससे काफी मदद मिली।

“चूनी गोस्वामी भारतीय फुटबॉल के एक पोस्टर ब्वॉय थे। वह ड्रिबलिंग के साथ एक शीर्ष स्तर के खिलाड़ी थे। उनका गेंद पर और खिलाड़ियों की अपेक्षा बेहतरीन नियंत्रण था। उनके पास गेंद पास करने एक बेहतरीन कला थी।''

रॉय ने कहा कि वह नेविल डिसूजा जैसे स्ट्राइकर की मदद कर सकते हैं और उन्हें गेंद को अपने पास से खूबसूरत तरीके पास करके स्कोर बना सकते हैं। चूनी गोस्वामी एक बेहतरीन फुटबॉलर होने के साथ-साथ अच्छे क्रिकेटर भी थे। वह बंगाल के कप्तान थे, उन्होंने बंगाल को 1971-1972 के रणजी ट्रॉफी के फाइनल तक पहुंचाया था।

1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में उनकी उपलब्धियों के बाद ट्रायल के लिए उन्हें इंग्लिश टॉप टियर क्लब टोटेनहम हॉट्सपुर से संपर्क किया गया था, लेकिन उन्होंने अपने क्लब मोहन बागान के प्रति वफ़ादारी निभाई और लिलीव्हाइट्स को ठुकरा दिया।

तुलसीदास बालाराम- एक जबरदस्त फुटबॉलर

पीके बनर्जी और चुन्नी गोस्वामी की तरह तुलसीदास बालराम ने भी 1962 में भारत के एशियाई खेलों के स्वर्णिम दौर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इसके साथ ही 1960 के रोम खेलों में भी सबको खासा प्रभावित किए थे। फुटबॉल कोच सैय्यद अब्दुल रहीम ने उस स्वर्णिम युग में खुद अपने आपको स्थापित किया, उन्हें आधुनिक फुटबॉल युग का नायक माना जाता है जहां तुलसीदास बालाराम भी आस-पास ही ठहरते थे, उन्होंने बहुत ही कम समय में एक अलग मुकाम हासिल किया।

यह हैदराबादी खिलाड़ी मुख्य रूप से लेफ्ट फ्लैंक था। इनके पास गेंद को आखिरी समय तक ड्रिबलिंग करने की महारथ हासिल थी। वह थियरी हेनरी और लियोनेल मेसी की तरह गेंद को अपने पास लाने की बेहतरीन कला थी।

रॉय ने याद करते हुए कहा, “तुलसीदास बालाराम एक मंझे हुए पूर्ण खिलाड़ी थे और आज के फुटबॉल में बहुत अच्छी तरह से फिट हो सकते थे। वह ड्रिबल कर सकते थे, स्कोर कर सकते थे और इसके साथ ही उनके पास एक शानदार हेडर था। बालाराम शायद अपने दिनों में एशिया में सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर थे।“

उनकी हरफनमौला क्षमता ने उन्हें बड़े मैचों के लिए भारत का एक बेहतरीन फुटबॉलर बना दिया था और जब भी टीम ने उनको याद किया तो शायद ही कभी टीम को वह हारने दिए होगें।

जरनैल सिंह - भारत की टीम में पंजाब का एक बेहतरीन खिलाड़ी

पंजाब के इस बेहतरीन खिलाड़ी के करियर के कई सबसे यादगार पल रहे हैं। जहां उन्होंने स्ट्राइकर के रूप में 1962 में जकार्ता में हुए एशियाई खेलों के सेमीफाइनल और फाइनल मुकाबले में गोल किया था। जो यह एक यादगार लम्हा रहा। जिसे जरनैल सिंह को भारतीय फुटबॉल के महान खिलाड़ियों में से एक माना जाता है।

जरनैल सिंह होशियारपुर पंजाब के रहने वाले हैं। जरनैल सिंह फुटबॉल फुटबॉल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक हैं। जो स्टॉपर-बैक के रूप में खेलते थे। वह अपने शारीरिक कौशल के साथ-साथ खेल को अच्छी तरह पढ़ने में महारत हासिल था।

रॉय ने कहा, “एक स्थिति में उन्हें अतीत में ले जाना बहुत मुश्किल था। वह लगभग छह फीट के एक बेहतरीन खिलाड़ी थे” जरनैल अपनी टीम के लिए किसी भी स्थिति में खड़े होने की क्षमता रखते थे। जिसे उन्होंने कई बार साबित भी किया।

1962 के एशियाई खेलों में जरनैल सिंह के सिर में चोट लग गई और उन्हें छह टांके लगाने पड़े थे। इसके बावजूद, उन्होंने सेमीफाइनल में दक्षिण वियतनाम के खिलाफ स्ट्राइकर के रूप में और फाइनल में दक्षिण कोरिया के खिलाफ खेलने के लिए उतरे और अपना बेहतरीन प्रदर्शन दिया।

जरनैल सिंह ने अपनी खेल की इस अनोखी प्रतिभा से सभी को हैरत में डाल दिया। 1964 में उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया और जिसके लिए उन्हें अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया, जो किसी भी भारतीय खिलाड़ी के लिए एक अभूतपूर्व उपलब्धि थी।

पीटर थंगराज - भारत के बेहतरीन डिफेंडर

1956 और 1960 के ओलंपिक के दौरान भारतीय टीम के गोलकीपर पीटर थंगराज अपने अंतरराष्ट्रीय करियर के दौरान टीम के लिए स्टिक के रूप में थे। थंगराज ने 1958, 1962 और 1966 के एशियाई खेलों में भी हिस्सा लिया और उन्हें 1958 में एशिया का सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर के रूप में चुना गया।

थंगराज अपने विरोधियों के खिलाफ तुरन्त प्रतिक्रिया देने के लिए जाने जाते थे। उनके छलांग लगाने की क्षमता ने उन्हें एक अंतिम रक्षक बना दिया।

रॉय ने कहा, "गोलकीपर के रूप में वह अपराजेय थे। उन्हें ग्राउंड शॉट्स के साथ थोड़ी कमजोरी थी, लेकिन हवा में वह एक शानदार खिलाड़ी थे। वह हमलों या कॉर्नर किक से गेंद को हवा में उछालते थे।

रॉय ने ऐस गोलकीपर की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए कहा, "यहां तक कि पॉइंट-ब्लैंक रेंज में वह चमत्कारिक प्रदर्शन दिखाते थे।"

सेलन मन्ना – एक बेहतरीन कप्तान और दिग्गज

सेनल मन्ना एक कप्तान, एक प्रमुख खिलाड़ी और वर्तमान में भारतीय कप्तान सुनील छेत्री के लिए एक बहुत ही हालिया मॉनीकर हो सकते हैं। उनकी खास बात ये है कि वह किसी भी जगह बड़ी आसानी से फिट हो जाते थे।

सेलन मन्ना भारतीय टीम के अब तक के सबसे महान कप्तानों में से एक हैं। 1951 में उन्होंने अपने पहले एशियाई खेलों में भारत का नेतृत्व किया और पीके बनर्जी, चूनी गोस्वामी एंड कंपनी को एक कदम आगे ले जाने में और अगले बैच की नींव रखने में अपना अहम योगदान दिया।

वह एक बेहतरीन लेफ्ट-बैक खिलाड़ी थे। सेलन ने मैदान पर अपने खेल की प्रतिभा से सभी को हैरत में डाल दिया, जिससे उन्हें एक महान खिलाड़ी और अन्य साथियों के लिए प्रेरणा के तौर पर माना जाता है।

दरअसल, मन्ना 1950 के फीफा विश्व कप में अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) के आखिरी समय में भारत की कप्तानी करने के लिए तैयार थे। सेलन अपने युग एक बेहतरीन खिलाड़ी के तौर पर जाने जाते हैं। इनको छोड़कर उस पीढ़ी में यूसुफ खान, नेविल डिसूजा, राम बहादुर और कई और खिलाड़ी शामिल थे।

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